पीतल के संविधान के साथ लोकेश मंगल
- फोटो : अमर उजाला, इंदौर
इंदौर के एडवोकेट लोकेश मंगल ने पीतल से 32 किलो वजनी, 54 पन्नों की संविधान की अनूठी प्रतिलिपि तैयार की है, जो उनके नवाचार और दृढ़ संकल्प का अद्भुत उदाहरण है। इस खास प्रतिलिपि को बनाने के पीछे उनकी सोच थी कि भारत के संविधान की मूल भावना को चित्रों के माध्यम से इस तरह से दर्शाया जाए कि आम लोग इसे आसानी से समझ सकें। लोकेश ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद और प्रावधान अक्सर जटिल होते हैं, जिन्हें हर व्यक्ति पूरी तरह से नहीं समझ पाता। इसी कारण, उन्होंने चित्रों का उपयोग करके इसे सरल और रोचक बनाने का प्रयास किया। संविधान की प्रतिलिपि को तैयार करने में पीतल का उपयोग करने का मुख्य कारण यह था कि इसे शुद्ध और स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है। इसके लिए उन्होंने संविधान विशेषज्ञों, धर्मगुरुओं और अन्य प्रमुख व्यक्तियों से विचार-विमर्श किया।
पीतल सबसे शुद्ध धातु, इसीलिए इसे चुना
प्रतिलिपि तैयार करने से पहले उन्होंने 25 सांसदों, 45 विधायकों, 20 कलेक्टरों और 17 संविधान विशेषज्ञों की राय ली। इसके बाद, उन्होंने साढ़े तीन महीने की मेहनत से इसे पूरा किया। दिलचस्प बात यह है कि पीतल की इस अनूठी प्रतिलिपि के 106 प्रिंट तैयार करने में केवल 14 घंटे का समय लगा। प्रतिलिपि का पहला और आखिरी पन्ना लेजर प्रिंटिंग तकनीक से बनाया गया है, जबकि अन्य पन्नों पर दो तरफा प्रिंटिंग की गई है। लोकेश का कहना है कि चित्रों का उपयोग इसलिए किया गया क्योंकि हर कोई चित्रों को आसानी से समझ सकता है, जबकि टेक्स्ट आधारित अनुच्छेद समझने में मुश्किल हो सकते हैं।
हजारों लोगों से लिया दस रुपए का सहयोग
इस परियोजना की लागत को पूरा करने के लिए लोकेश ने अनोखी पहल की। उन्होंने लगभग 4 हजार 900 लोगों से 10-10 रुपये की छोटी-छोटी राशि एकत्रित की, जिससे इस प्रतिलिपि की कुल लागत 49,000 रुपये आई। उनका कहना है कि आगे भी इस प्रकार की प्रतिलिपियां बनाने के लिए सहयोग राशि जुटाई जाएगी। लोकेश ने बताया कि इस पहल के लिए उन्हें कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत से प्रेरणा मिली, और उन्होंने इस संविधान की एक प्रति उन्हें भेंट भी की। इस संविधान में उन्होंने जलेबी का भी जिक्र किया है, जो हमारे राष्ट्रीय पकवान के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं।