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MP News: इंदौर में कैबिनेट बैठक पर विशेष; सात मंजिलें, चार लाख का खर्च और 90 साल की कहानी

सार

इंदौर शहर के बीचों बीच स्थित ऐतिहासिक राजवाड़ा में मंगलवार को मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक होने वाली है। यह राजवाड़ा कभी होलकर राजवंश का प्रमुख केंद्र हुआ करता था और आज भी इंदौर की पहचान माना जाता है।
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राजवाड़ा पैलेस - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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इंदौर शहर के बीचों बीच स्थित ऐतिहासिक राजवाड़ा में मंगलवार को मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक होने वाली है। यह राजवाड़ा कभी होलकर राजवंश का प्रमुख केंद्र हुआ करता था और आज भी इंदौर की पहचान माना जाता है। राजवाड़ा की कहानी बहुत दिलचस्प है। साल 1734 में पेशवा बाजीराव ने खासगी जागीर की ज़मीन मल्हारराव होलकर की पत्नी गौतमाबाई के नाम करवाई थी। इसके बाद मल्हारराव होलकर इंदौर आकर बस गए और साल 1747 में उन्होंने एक भव्य महल बनवाने का फैसला किया। इसी महल को राजवाड़ा कहा जाता है। एक अनुमान के मुताबिक इस राजवाड़ा को बनाने में करीब चार लाख रुपये (उस समय लगभग 27 हजार पाउंड) खर्च हुए थे और इसे पूरा बनने में लगभग 90 साल का समय लगा था।
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धीरे धीरे बनकर हुआ तैयार

जब मल्हारराव होलकर का निधन हुआ, तब तक राजवाड़ा का निर्माण अधूरा था। इसके बाद रियासत की ज़िम्मेदारी देवी अहिल्या बाई होलकर ने संभाली और उन्होंने महेश्वर को राजधानी बना दिया। उस समय इंदौर को केवल एक सैनिक छावनी के रूप में उपयोग किया गया।

फिर तुकोजीराव होलकर प्रथम ने राजवाड़ा के अधूरे काम को दोबारा शुरू करवाया। लेकिन उनके निधन के बाद होलकर परिवार में विवाद हो गया और यशवंतराव होलकर प्रथम ने राजधानी को भानपुरा (मंदसौर) शिफ्ट कर दिया। 1818 में मंदसौर संधि के बाद इंदौर को फिर से होलकर रियासत की राजधानी बना दिया गया।
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इसके बाद मल्हारराव होलकर द्वितीय के समय में प्रधानमंत्री तात्या जोग ने राजवाड़ा के निर्माण को आगे बढ़ाया। यह निर्माण कार्य हरिराव होलकर के कार्यकाल (1834–1843) में पूरा हुआ। इस तरह अलग अलग शासकों के समय में राजवाड़ा धीरे धीरे बनकर तैयार हुआ।

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राजवाड़ा की बनावट

राजवाड़ा लगभग 6175 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई 29 मीटर है। इसका मुख्य दरवाज़ा 6.70 मीटर ऊंचा है। इस प्रवेश द्वार के ऊपर सात मंजिलें बनाई गई थीं, जिनमें सुंदर झरोखे हैं। पहली मंजिल राजपूत काष्ठ (लकड़ी) शैली में बनी है, और ऊपर की चार मंजिलें मराठा शैली में बनी हैं। इसमें चूना और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है। पूरी इमारत में मेहराब, सुंदर खंभे और उन पर की गई नक्काशी इसे खास बनाती है।

गणेश हॉल बना फ्रेंच शैली में

राजवाड़ा के अंदर गणेश हॉल और दरबार हॉल को फ्रेंच क्लासिक शैली में बनाया गया था। यहाँ लंबे बरामदे, मल्हारी मार्तंड का मंदिर, रहने के कमरे, रिकॉर्ड रखने का कमरा, कांच महल, हुजूर खाना, और असली नकली सिक्के जांचने वाला गोल्ड स्मिथ कक्ष थे।
दीवारों पर खूबसूरत चित्र बनाए गए थे, जो नाथद्वारा, कोटा बूंदी और मालवा की कला शैली में थे। इन चित्रों में रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और लोक कला की कहानियाँ दिखाई गई थीं।

तीन बार लगी आग

राजवाड़ा में तीन बार आग लगी थी:
  • 1801 में ग्वालियर के सेनापति सरजेराव घाटगे ने हमला किया और बड़ी लूट के साथ आगजनी की, जिससे राजवाड़े का बड़ा हिस्सा जल गया।
  • 1834 में फिर आग लगी, जिसमें लकड़ी से बनी एक मंजिल पूरी तरह जल गई।
  • 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगों में राजवाड़ा एक बार फिर जल गया और काफी हिस्सा नष्ट हो गया।

राज्याभिषेक और लोकमान्य तिलक की उपस्थिति

राजवाड़ा में दो बार होलकर राजाओं का राज्याभिषेक हुआ:
  • 1852 में तुकोजीराव द्वितीय
  • 1886 में शिवाजीराव होलकर
  • 1886 में शिवाजीराव के राज्याभिषेक में प्रसिद्ध नेता लोकमान्य तिलक भी शामिल हुए थे।

1974 में बेचा गया था राजवाड़ा

राजवाड़ा को 1974 में निजी हाथों में बेच दिया गया था। तब पत्रकार बालेराव इंगले और नगर के कई संगठनों ने “राजवाड़ा बचाओ” अभियान चलाया। यह आवाज भोपाल तक पहुंची और मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने इस पर ध्यान दिया। शासन ने राजवाड़ा खरीदकर इसे पुरातत्व विभाग को सौंप दिया। इसका भव्य कार्यक्रम अक्टूबर 1976 में हुआ।

गौरव फाउंडेशन ने कराया राजवाड़ा का जीर्णोद्धार

इंदौर गौरव फाउंडेशन ने लोगों की मदद से राजवाड़ा की मरम्मत और सजावट (जीर्णोद्धार) का काम करवाया। जुलाई 2003 में नये दरबार हॉल और परिसर को जनता के लिए खोला गया। करीब 1 करोड़ रुपये खर्च हुए और खास ध्यान रखा गया कि राजवाड़ा की पुरानी बनावट और कला जैसी थी, वैसी ही बनी रहे।
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राजवाड़ा से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें
  • 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय होलकर महाराज ने कई अंग्रेज अफसरों को राजवाड़ा में छिपने की जगह दी थी।
  • महाराजा यशवंतराव होलकर द्वितीय ने कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा यहीं से की थी।
  • साथ ही, पहले और दूसरे विश्व युद्ध में जाने वाले सैनिकों को यहीं से विदा किया गया था।
  • मुगलों के हाकिम बाड़े की जगह मल्हारराव होलकर प्रथम ने यह महल परिवार के रहने और काम करने के लिए बनवाना शुरू किया था।
  • कुलदेवता मल्हारी मार्तंड की मूर्ति की स्थापना राजवाड़ा में ही की गई थी।
  • महाराजा शिवाजीराव होलकर को कुश्ती का बहुत शौक था। उन्होंने राजवाड़ा में ही एक अखाड़ा बनवाया था और वे खुद भी कुश्ती लड़ते थे।
  • आज़ादी के बाद भी कोई बड़ा उत्सव, जीत की खुशी या राजनीतिक सभा अक्सर राजवाड़े के सामने होती है।
  • होलकर काल की परंपरा के अनुसार आज भी होलिका दहन राजवाड़े के सामने ही किया जाता है।
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