समान नागरिक संहिता के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में कमेटी गठित करने की घोषणा की है। इसके बाद फिर यह मुद्दा चर्चा मेें है। देश के अन्य प्रदेशों में भी इसके लिए समितियां बनाने की कवायद हो रही है। इंदौर के विधि विशेषज्ञों की राय है कि समान नागरिक संहिता लागू होना चाहिए। यदि मध्य प्रदेश में कमेटी गठित हो रही है तो यह अच्छी पहल है।
पूर्व राज्यपाल व जस्टिस रहे वीएस कोकजे का कहना है कि सभी धर्मों के अधिकार समान होना चाहिए। यदि मुस्लिम समाज भारतीय दंड संहिता को मानता है तो फिर समान नागरिक संहिता को न मानने की कोई वजह नहीं होना चाहिए। कोकजे का कहना है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू करने में सरकार को देर नहीं करना चाहिए। सबके लिए कानून समान होना चाहिए। हिन्दू समाज में भी पहले बहुविवाह की प्रथा थी। उसे भी कानून के दायरे में लाकर समाप्त किया गया।
लागू हो भी गया तो शरीयत का कानून मानेंगे
वरिष्ठ अभिभाषक शन्नो शफूगता खान का कहना है अब कोई दो-तीन शादियां नहीं करता। यदि समान नागरिक संहिता लागू हो भी गई तो मुस्लिम समाज कुरान में लिखी गई बात ही मानेगा।
तो फिर दंड भी मानें
वरिष्ठ अभिभाषक अंशुमन श्रीवास्तव का कहना है कि मुस्लिम समाज खुद का धार्मिक कानून भी आधा अधूरा मानता है। कुरान में चोरी करने पर हाथ काटने की सजा है और बलात्कार पर मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन उसे नहीं माना जाता। देश में समान नागरिक संहिता लागू होना चाहिए। सिख, जैन सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदाय भी हैं जिसने धार्मिक यात्रा पर सबसिडी नहीं मिलती। सबके लिए बराबरी का कानून होना चाहिए।
इंदौर के चर्चित शाहबानो केस ने दिया था समानता का हक, लेकिन तब बना दिया था नया कानून
चर्चित शाहबानो केस भी कहीं न कहीं समानता के हक की पैरवी करता है। शाहबानो भी इंदौर की रहने वाली थी। अब उनके बच्चे तो इंदौर में नहीं रहते, लेकिन परिचित रिश्तेदार यहां रहते हैं। शाहबानो के पति मोहम्मद खान खुद वकील थे, लेकिन केस हारने के बाद उन्होंने तनाव में आकर वकालत छोड़ दी थी। 1978 में शाहबानो को पति मोहम्मद खान ने तलाक दे दिया था। शाहबानो की पांच संतानें थीं।
पति के फैसले के खिलाफ शाहबानो गुजारा भत्ते के लिए कोर्ट गईं। फैसला उनके पक्ष में आया तो मुस्लिम समाज ने विरोध शुरू कर दिया। उस दौर में फैसले के खिलाफ ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड नाम की एक संस्था बनाई गई। देशभर में आंदोलन हुए। उग्र आंदोलनों की चेतावनी दी गई। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मानते हुए मुस्लिम महिला कानून 1986 को पास कर दिया और शाहबानो अपने हक से वंचित रह गईं।