प्रदेश सरकार द्वारा जारी 'उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया' की अधिसूचना को लेकर दायर जनहित याचिका पर आज हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस सुबोध अभ्यंकर एवं जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने सरकार सहित सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
इस याचिका में 16,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के गठन की प्रक्रिया, संविधान के 74वें संशोधन के उल्लंघन और क्षेत्र के नाम (इंदौर का नाम उज्जैन के बाद रखने) पर आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता एडवोकेट अक्षत पहाड़िया की ओर से कहा गया है कि इसमें मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के गठन से जुड़े कानूनी नियमों की अनदेखी की गई है। सवाल उठाया गया है कि क्या इसके लिए स्थानीय निकायों से उचित सलाह ली गई थी?
प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी योजना
मध्यप्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी शहरी विकास योजनाओं में मेट्रोपॉलिटन एरिया की योजना शामिल है। हाई कोर्ट में इस पर चल रही सुनवाई पर प्रशासनिक, राजनीतिक और शहरी विकास से जुड़े सभी पक्षों की निगाहें टिकी हुई हैं। न सिर्फ उज्जैन और इंदौर बल्कि पूरे प्रदेश के लिए यह कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण योजना है।
38 तहसील और 2781 गांव शामिल
प्रस्तावित मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र की आबादी को इससे कई स्तर पर फायदे होंगे। इसमें शामिल होने वाली अनुमानित आबादी 75.34 लाख बताई गई है। योजना को चार चरणों में विकसित करने की रूपरेखा तैयार की गई है। उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया में इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, शाजापुर और रतलाम जिलों की 38 तहसीलों तथा 2781 गांवों को शामिल किया गया है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के तहत विशाल मेट्रोपॉलिटन एरिया का प्रस्ताव तैयार किया गया है जिसमें लगभग 16 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल शामिल है।