फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

स्वास्थ्यः संयुक्त परिवारों का विघटन और मोबाइल की लत बच्चों को ऑटिज्म की ओर धकेल रहा

Sun, 13 Sep 2026 06:24 AM IST
Arjun Richhariya न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

ऑटिज्म और न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों को समझने की कोशिश पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘द सेंसेरी चाइल्ड’ का इंदौर में हुआ लॉन्च, व्यवहार के पीछे छिपी जरूरतों को समझने का संदेश देती है यह डॉक्यूमेंट्री। 
विज्ञापन
बच्चों ने फिल्म का लुत्फ उठाया। - फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आज कई तरह के सामाजिक बदलाव तेजी से हो रहे हैं। संयुक्त परिवारों का विघटन, मोबाइल की लत और कई अन्य कारणों से बच्चों में मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं। अगर समय रहते इन्हें पहचान लिया तो इनका इलाज भी संभव है लेकिन इसके लिए इनके लक्षणों की जानकारी भी होना आवश्यक है। अधिकतर माता पिता अपने बच्चों के असामान्य व्यवहार को समझ नहीं पाते और समय पर इलाज न मिलने का कारण इन बच्चों को स्वस्थ होने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए इन विषयों की जागरूकता बहुत जरूरी है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इंदौर के डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई है। इंदौर के होटल में इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘द सेंसेरी चाइल्ड’ को लॉन्च किया गया। इस मौके पर इस तरह की परेशानियों से ठीक हुए बच्चों और माता पिता ने भी अपने प्रेरणादायक अनुभव साझा किए। फिल्म को डॉ. प्रियंका गर्ग द्वारा लॉन्च किया गया।
विज्ञापन


सही समय पर लक्षणों की पहचान और मार्गदर्शन से जल्द ठीक होते हैं बच्चे
डॉ प्रियंका गर्ग एवं डॉ सुभाष गर्ग के अनुसार, ऑटिज्म और न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों के व्यवहार एवं संवेदी जरूरतों पर केंद्रित इस तरह की पहली डॉक्यूमेंट्री ‘द सेंसेरी चाइल्ड’ का इंदौर में लॉन्च हुआ। इस मौके पर डॉक्टरों ने बताया कि कई माता-पिता मानते हैं कि ऑटिज्म में सुधार संभव नहीं है, जबकि समय पर पहचान, सही विशेषज्ञ मार्गदर्शन और थैरेपी से बच्चों के विकास एवं दैनिक जीवन की क्षमताओं में महत्वपूर्ण सुधार संभव है। डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘द सेंसेरी चाइल्ड’ के लॉन्च अवसर पर सैकड़ों ऐसे बच्चे अपने माता-पिता के साथ शामिल हुए, जो ऑटिज्म से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद उपचार, थैरेपी और निरंतर प्रयासों के माध्यम से अपने जीवन में उल्लेखनीय सुधार हासिल कर चुके हैं। बच्चों और उनके माता-पिता की मौजूदगी ने कार्यक्रम को एक विशेष भावनात्मक और प्रेरणादायक आयाम दिया।

व्यवहार को समस्या नहीं, संकेत के रूप में समझने का संदेश
‘द सेंसेरी चाइल्ड’ में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि कई बार बच्चों के व्यवहार को जिद, शरारत या अनुशासन की समस्या समझ लिया जाता है, जबकि उसके पीछे उनकी संवेदी, भावनात्मक अथवा विकासात्मक जरूरतें छिपी हो सकती हैं। डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से माता-पिता और समाज को यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि बच्चे के व्यवहार को केवल बदलने या रोकने के बजाय उसके पीछे के कारण को समझना अधिक जरूरी है।
विज्ञापन


बच्चों और माता-पिता की कहानियां बनीं प्रेरणा
फिल्म के लॉन्च कार्यक्रम में शामिल बच्चों और उनके माता-पिता ने अपनी व्यक्तिगत यात्राओं और अनुभवों को भी साझा किया। कई परिवारों ने बताया कि सही समय पर पहचान, विशेषज्ञों की सलाह, थैरेपी, परिवार के सहयोग और लगातार प्रयासों से बच्चों के व्यवहार, संवाद और दैनिक जीवन की क्षमताओं में सकारात्मक बदलाव संभव हुआ। कार्यक्रम में बच्चों की मौजूदगी ने यह संदेश भी दिया कि ऑटिज्म से जुड़ी चुनौतियों के साथ आगे बढ़ते हुए बच्चे अपनी क्षमताओं और प्रतिभाओं के साथ बेहतर जीवन की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। लॉन्च इवेंट में डॉ सुभाष गर्ग एवं डॉ प्रियंका गर्ग, डॉ शुभांगिनी, डॉ ऋषिकेश, डॉ किशन, डॉ अमित,  डॉ राजा,  डॉ जया पॉल, डॉ ध्रुव दवे, डॉ राशि गुप्ता, डॉ अनुशिखा मौर्या, डॉ गायत्री जैरिया डॉ मेघा परमार उपस्थित हुए।

माता-पिता के लिए जागरूकता पर जोर
डॉ. प्रियंका गर्ग ने कहा कि बच्चों के व्यवहार को समझना उनके विकास की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है। माता-पिता को बच्चे के व्यवहार को केवल समस्या मानने के बजाय यह समझने की जरूरत है कि बच्चा अपने व्यवहार के माध्यम से क्या बताने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा, “हर व्यवहार के पीछे कोई न कोई कारण हो सकता है। बच्चे के व्यवहार को बदलने से पहले हमें उसके व्यवहार को समझने की कोशिश करनी चाहिए।” उन्होंने आगे कहा कि परिवार और समाज की जागरूकता बच्चों के बेहतर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जरूरत इस बात की है कि बच्चों को केवल उनके व्यवहार के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी संवेदी जरूरतों, भावनाओं, क्षमताओं और व्यक्तिगत विशेषताओं के आधार पर समझा जाए।

असामान्य व्यवहार के पीछे एक बच्चा है जिसे समझना जरूरी है
डॉक्टरों ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘द सेंसेरी चाइल्ड’ का उद्देश्य ऑटिज्म और न्यूरोडाइवर्जेंस को लेकर समाज में बेहतर समझ विकसित करना और माता-पिता को यह अहसास दिलाना है कि सही मार्गदर्शन, विशेषज्ञ सहयोग और निरंतर प्रयासों के माध्यम से बच्चों के विकास में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं। फिल्म के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि “व्यवहार के पीछे भी एक बच्चा है और उस बच्चे को समझना सबसे जरूरी है।”
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें