कारसेवक के रुप में लक्ष्मण सिंह गौड़, कैलाश शर्मा अशोक सिंघल के साथ
- फोटो : amar ujala digital
अयोध्या में 22 जनवरी को मंदिर का लोकार्पण हो रहा है। अयोध्या सजी-संवरी है, लेकिन 32 साल पहले रामजन्म भूमि आंदोलन के समय अयोध्या कर्फ्यू के साए में रहती थी। सड़कें पत्थरों से पटी रहती थी और कारसेवक को कैद करने के लिए जेलें छोटी पड़ जाती थी। 1989 से लेकर 1993 तक इंदौर के भी कई कारसेवक अयोध्या में गए थे। कोई गिरफ्तार हो गया तो कोई ढहाए गए विवादित ढ़ाचे की ईट अपने साथ लाए और संभालकर रखी। हमने कुछ कारसेवकों से रामजन्म भूमि आंदोलन के बारे में बात की तो उन्होंने कई किस्से साझा किए।
हिरासत से निकल कर भागे थे
पूर्व पार्षद कैलाश यादव 27 साल के थे, तब वे पहली बार वर्ष1989 में अयोध्या गए थे। तब यूपी में मुलायम सिंह सरकार थी। कारसेवकों को ट्रेनों से उतरे ही गिरफ्तार किया जा रहा था। यादव बताते है कि हम ट्रेन से अयोध्या जाने के लिए निकले, लेकिन रास्ते में एक स्टेशन पर रेलगाड़ी से कारसेवकों को उतार कर पुलिस गिरफ्तार कर रही थी।
हमारे डिब्बे में आकर पुलिस ने जब पूछा कि कहां जा रहे है तो हमने प्रयागराज के बजाए मुगलसराय कहा। पुलिसकर्मियों ने हमें नहीं उतरा, लेकिन प्रयागराज में उतरे तो कर्फ्यू लग चुका था। इंदौर के कुछ कारसेवक वहां से दूसरी ट्रेन में बैठे, लेकिन मेरठ में हमें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। तीन घंटे थाने की हवालात में हम बैठे रहे, लेकिन बाद में हम थाने से भाग गए अौर पेपर वाहन में बैठकर अयोध्या पहुंचे और कारसेवा की।
टेंट वालों के हथौड़े, सब्बल उठाकर ले आए
भाजपा के पूर्व नगर अध्यक्ष कैलाश शर्मा कहते है कि 6 दिसंबर1992 को मालवा प्रांत के कारसेवक ही सबसे आगे थे। विवादित ढांचे के पास के बेरिकेड हटाकर कारसेवक सक्रिय हो गए। वहां अस्थाई टेंट लगाने के लिए हथौड़े, सब्बल और रस्सियां थी। उसका उपयोग कारसेवकों ने किया।
पूर्व पार्षद चंदू शिंदे बताते है कि कारसेवा करने के बात अयोध्या के पत्थर, ईटें निशानी बतौर कारसेवक उठाकर लाए थे और कई वर्षों तक उसे संभाल कर भी रखा। कारसेवा में शामिल हुए महेंद्र वर्मा बताते है कि सबसे कठिन दौर 1989 की कारसेवा का था। तब चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात थी और पुलिस ने गोलियां भी चलाई थी। कारसेवक अपनी जान की परवाह किए बगैर जन्मभूमि पर मंदिर बनाने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार थे।