विजय नगर स्थित मेदांता अस्पताल के आईसीयू में लगी आग के मामले में नई बात सामने आई है। कलेक्टर ने जो जांच दल बनाया था उसकी रिपोर्ट में तकनीकी खामियों की बात कही गई है। एक ही सर्किट पर अधिक पावर पॉइंट बना दिए थे और खुली वायरिंग भी मौके पर पाई गई। अब सुधार होने तक आईसीयू में मरीजों की भर्ती पर रोक लगाई गई है।
गौरतलब है कि मेदांता अस्पताल के आईसीयू में रविवार शाम आग लग गई थी। 14 बेड के आईसीयू यूनिट में आग लगी थी। उस समय बेड पर 10 मरीज भर्ती थे। अचानक धुआं उठा था जिस कारण मरीज और उनके परिजन घबरा गए थे। हालांकि कुछ देर में अस्पताल प्रबंधन ने आग पर काबू पा लिया था। अस्पताल प्रबंधन ने आईसीयू के मरीजों को अन्य आईसीयू में शिफ्ट किया था। बाद में अस्पताल प्रबंधन का बयान आया था जिसमें कहा था कि हमारे चौथी मंजिल के मेडिकल आईसीयू में छोटा शॉर्ट सर्किट था। जिसके परिणामस्वरूप धुआं निकला। हालांकि हमारे मजबूत अग्निशमन प्रोटोकॉल ने तुरंत अलार्म बनाया और हमारी प्रतिक्रिया प्रणाली को सक्रिय कर दिया। हमने पहली प्राथमिकता पर सभी एहतियात और सुरक्षा के साथ अन्य आईसीयू में पेटिनेट्स को स्थानांतरित कर दिया और स्थिति को कुशलतापूर्वक नियंत्रित किया गया। कलेक्टर मनीष सिंह ने इस मामले की जांच के आदेश दिए थे।
ये कमियां पाईं जांच दल ने
कलेक्टर द्वारा गठित जांच दल में एडीएम पवन जैन , सीएमएचओ डॉ. बीएस सैत्या सहित अन्य अधिकारी शामिल थे। टीम ने मौका मुआयना करने के बाद 24 घण्टे में अपना जांच प्रतिवेदन कलेक्टर को सौंपा। इसमें भर्ती मरीजों के परिजन और हॉस्पिटल स्टॉफ के भी बयान दर्ज किए। इस आधार पर कलेक्टर के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग ने मेदांता हॉस्पिटल में जो कमी पाई गई उसके मुताबिक हॉस्पिटल प्रबंधन को पूर्ति करने के निर्देश दिए गए हैं। जांच दल ने पाया कि आईसीयू के प्रत्येक बेड के लिए अलग-अलग इलेक्ट्रिक सर्किट नहीं लगाए गए और एक ही सर्किट पर अधिक पॉवर पॉइंट बना दिए और खुली वायरिंग भी मौके पर पाई गई, जबकि मैटेलिक कन्ड्यूट में से वायरिंग को ले जाना था। स्विच बोर्ड भी फायरप्रूफ बॉक्स में लगाया जाना था जबकि प्लायवुड में लगा पाया गया। दुर्घटना के समय एमसीबी भी ठीक से काम नहीं कर रही थी। इन खामियों के चलते ही शॉर्ट सर्किट से आग लगी। हॉस्पिटल प्रबंधन को तकनीकी एक्सपर्ट के माध्यम से उपरोक्त खामियों को दूर करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही ये भी कहा गया कि तब तक गंभीर मरीजों या ऐसे मरीज जिन्हें आईसीयू की आवश्यकता हो उन्हें अस्पताल में भर्ती न किया जाए।