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इंदौर: आईआईटी की टीम ने की तीन अणुओं की पहचान, दुर्लभ फ्रेजाइल एक्स बीमारी के इलाज का किया दावा

Sat, 05 Feb 2022 03:45 PM IST
चंद्रप्रकाश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

इंदौर आईआईटी की टीम ने तीन अणुओं की पहचान की है। दावा किया है कि इससे फ्रेजाइल एक्स बीमारी का इलाज संभव हो सकेगा। शोध को हाल ही में अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर के मॉलिक्यूलर न्यूरोबायोलॉजी सेक्शन में प्रकाशित भी किया गया है। 
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आईआईटी की टीम जिसने की शोध - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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इंदौर के भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थान (आईआईटी-इंदौर) ने एक महत्वपूर्ण खोज की है। दावा किया है कि उसकी टीम ने 3 अणुओं की पहचान की है, जिससे फ्रेजाइल एक्स जैसी बीमारी का उपचार संभव है। यह बच्चों और बुजुर्गों में होने वाला एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकार है। टीम ने रिसर्च के दौरान नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट अमेरिका की लैब की ओर से जारी 2.5 लाख अणुओं में से इन 3 अणुओं की पहचान की है।  
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दरअसल, आईआईटी के रिसर्चर्स का दावा है कि आईआईटी इंदौर के बायोसाइंस के प्रोफेसर अमित कुमार की रिसर्च टीम ने तीन नए अणुओं की पहचान की है। इन अणुओं से फ्रेजाइल एक्स एसोसिएट सिंड्रोम यानी गतिभंग सिंड्रोम (एफएक्सटीएएस) पर काबू पाया जा सकता है। रिसर्च टीम के लीडर डॉ अमित कुमार ने बताया कि वर्तमान में एफएक्सटीएएस को मनोरोग और व्यवहार संबंधी समस्या मानकर उपचार किया जा रहा है। इस विकार के लिए एफएमआर-वन नामक जीन के डीएनए अनुक्रम में विशिष्ट प्रकार के उत्परिवर्तन को जिम्मेदार माना जाता है। उत्परिवर्तन के कारण दिमाग में खास सेल सीजीजी ट्राईन्यूक्लियोटाइड का असीमित दोहराव होने लगता है। स्वस्थ व्यक्ति में ट्राईन्यूक्लियोटाइड दोहराव की संख्या 55 है जबकि एफएक्सटीएएस के रोगियों में यह दोहराव 200 से ज्यादा होता है। यह अतिरिक्त ट्राई न्यूक्लियोटाइड दोहराव न्यूरोनल कोशिकाओं में विषाक्तता का कारण बनता है जो अंततः मस्तिष्क कोशिकाओं के पतन का कारण बनता है। प्रारंभिक अध्ययनों में ये अणु ट्राइन्यूक्लियोटाइड अनुक्रम के दोहराए जाने वाले आरएनए से जुड़े न्यूरोनल कोशिकाओं में विषाक्तता को कम करते हैं। सामान्य कोशिका के समरूप व्यवहार्यता को बहाल करते हैं। टीम में पीएचडी कर रहे शोधार्थी अरुण कुमार वर्मा, ईशान खान, सुबोध कुमार मिश्रा शामिल थे।

दुर्लभ है यह संतुलन से जुड़ा विकार
फ्रेजाइल एक्स सिंड्रोम दुर्लभ वंशानुगत बीमारी है, जो बच्चों में बौद्धिक और विकास संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है। इसे मार्टिन-बेल सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है। इसकी कोई दवा उपलब्ध नहीं है। दुनिया में चार हजार पुरुषों में से एक और छह से आठ हजार महिलाओं में से किसी एक को यह बीमारी होती है। इसके चलते बच्चों या बुजुर्गों में सामान्य गतिशीलता यानी चलने हाथ-पैरों और शरीर को संतुलित करने में परेशानी होती है। भूलने की बीमारी, स्वायत्त शिथिलता, संज्ञानात्मक गिरावट, दौरे और पार्किंसन के लक्षण भी हो सकते हैं। यह विकार दुनियाभर में 4000 पुरुषों में से एक और 6000-8000 महिलाओं में से एक को प्रभावित करता है।
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अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित किया शोध
शोध को हाल ही में अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर के मॉलिक्यूलर न्यूरोबायोलॉजी सेक्शन में प्रकाशित भी किया गया है। आईआईटी का अध्ययन तीन अलग-अलग चरणों में किया गया। पहले चरण के अंत में तीन अणुओं को उत्परिवर्तित सीजीजी रिपीट आरएनए के खिलाफ चयनात्मक और विशिष्ट पाया गया। कोशिकीय-आधारित अध्ययनों में भी अधिक प्रभावी पाया गया। चिकत्सकीय उपयोग के लिए आगे बढ़ने के लिए इस सिद्धांत का पशुओं पर प्रयोग कर परीक्षण किया जाएगा।
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