मध्य प्रदेश के जीवाजी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग ने एक अनोखी पहल की है। जीवाजी विश्वविद्यालय के कैंपस में लगे पेड़ों पर बारकोड लगाए गए हैं। इसके जरिए मोबाइल से स्कैन कर उस पेड़ का नाम, महत्व और उसकी उपयोगिता को जाना जा सकेगा। यह अनूठी पहल की शुरुआत करने वाली जीवाजी विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश की पहली यूनिवर्सिटी बन गई है।
बारकोड लगाने की प्रक्रिया चल रही
पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर डॉ. हरेंद्र शर्मा ने बताया कि जीवाजी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग द्वारा इस अनूठे प्रयोग का मकसद यह है कि इससे छात्रों के साथ-साथ जीवाजी विश्वविद्यालय के कैंपस में आने वाली आम लोग पेड़ों के बारे में जान सकेंगे और उसके महत्व और उसकी उपयोगिता के बारे में ज्ञान मिलेगा। इसके साथ ही पेड़ का चिकित्सा के क्षेत्र में कितना फायदा है और यह पेड़ कितनी ऑक्सीजन छोड़ता है इसके बारे में भी जानकारी मिल सकेगी। अभी कुल 15 प्रजातियों के पौधों में यह बारकोड लगाए गए हैं और धीरे कैंपस में लगे 56 प्रजाति के पेड़ों में बारकोड लगाने की प्रक्रिया चल रही है।
बता दें पेड़ पर लगे बारकोड को मोबाइल में स्कैन करना होगा। उसके बाद उस पेड़ का नाम, महत्व और उसकी उपयोगिता को जान सकेंगे। विद्यार्थियों के अलावा सबसे ज्यादा फायदा उन लोगों को भी होगा जो सुबह जीवाजी कैंपस में मॉर्निंग वॉक के लिए पहुंचते हैं। ऑक्सीजन जॉन होने के कारण रोज लगभग 3000 से अधिक लोग मॉर्निंग वॉक के लिए यहां आते हैं। यही वजह है कि यहां आने वाले लोगों के लिए यह बारकोड सबसे ज्यादा उपयोगी साबित होगा। क्योंकि आम लोगों को पेड़ों के बारे में जानकारी मिल सकेगी।
ग्रीन कैंपस के नाम से भी जाना जाता है
कैंपस में 5000 से अधिक पेड़ लगे हुए हैं। इसके साथ ही इससे दोगुनी संख्या छोटे पेड़ों की है। इस कैंपस में 56 प्रजाति के पेड़ लगे हुए हैं, जिनमें नीम के पेड़ों की संख्या 650, अशोक के पेड़ों की संख्या 390, टीक के 296 और आम के 120 बड़े पेड़ हैं। इसके साथ ही सफेद काला बबूल, एप्पल, कचनार, पलाश, शीशम, कदम, गुलमोहर, गुलमोहर, आमला, बरगद, गूगल, पेपर सहित 56 प्रजाति के पेड़ यहां पर लगे हुए हैं। इस कैंपस में लगे हर पेड़ की अपनी उपयोगिता है। यह चिकित्सा के क्षेत्र में काफी लाभदायक है। यहां सबसे अधिक ऑक्सीजन पेड़ों की संख्या सबसे अधिक है इसलिए इसे ग्रीन कैंपस के नाम से भी जाना जाता है।