Gwalior: संगीत सम्राट तानसेन की याद में राष्ट्रीय संगीत महोत्सव हो रहा है।
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संगीत सम्राट तानसेन की याद में हो रहे राष्ट्रीय संगीत महोत्सव के मंच पर नई पीढ़ी के श्रेष्ठ शास्त्रीय संगीत के गायकों में शुमार रमाकांत गायकवाड़ का ख्याल गायन हुआ। मीठे-मीठे सुरों में पगी यह प्रस्तुति रसिकों को विभोर कर गई।
तानसेन समारोह की बुधवार की प्रातःकालीन सभा में मुंबई से पधारे रमाकांत ने अपने गायन का आगाज़ राग ‘तोड़ी’ से किया। किराना और पटियाला घराने की सभी विशेषताएं अपने गायन में समेटे हुए उन्होंने जब राग का विस्तार किया तो सुरों के फूल खिलते चले गए। विलंबित खयाल में लय को बढ़ाते हुए बहलावों की उन्होंने शानदार प्रस्तुति दी। इसके बाद विविधतापूर्ण तानों ने रसिकों को रस विभोर कर दिया। रमाकांत की लयकारी का कमाल हतप्रभ करने वाला था। उन्होंने अपने गायन का समापन प्रसिद्ध ठुमरी ‘मोरे नैन लगेगी बरसात, बलम मोहि छोड़ न जाना’ के साथ किया। उनके साथ तबले पर अनिल मोघे और हारमोनियम पर महेश दत्त पांडेय ने संगत की।
शिराज अली के सरोद वादन से रसिकों के कानों में घुली मिठास
तानसेन समारोह के भव्य एवं आकर्षक मंच पर कोलकाता से पधारे प्रसिद्ध मैहर सांगीतिक घराने के सुयोग्य प्रतिनिधि उस्ताद शिराज अली खां ने सरोद से जमकर सुरवर्षा की। शिराज अली महान संगीतज्ञ बाबा अलाउद्दीन खां के पड़पोते हैं। उन्होंने अपने गायन के लिए राग ‘विलाशखानी तोड़ी’ को चुना। इस राग में उन्होंने अलाप जोड़ झाला के बाद विलंबित गत की मनोहारी प्रस्तुति दी। सरोद के सुरों के जबरदस्त उतार-चढ़ाव के बीच शिराज अली ने राग-रचनाओं की सृष्टि कर सुर और लय को इस तरह निबद्ध किया कि संपूर्ण प्रांगण सुरों के माधुर्य से भर गया। शिराज अली के साथ तबले पर सुप्रसिद्ध तबला वादक हितेन्द्र दीक्षित, पखावज पर मैनक विश्वास व सरोद पर दिप्त नील भट्टाचार्य ने संगत की।