गोंडी भाषा मध्य और पूर्वी भारत के एक बड़े हिस्से में बोली जाती है। इसे बोलने वाले तो लाखों में हैं, लेकिन इस बेहद पुरानी गोंडी भाषा का न तो शब्दकोष है और न ही इसका मानकीकरण हो सका है।
मान्यता है कि गोंडी भाषा सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान बोली जाने वाली द्रविड़ भाषा से ही निकली है। कई पुरातत्वविद् और भाषाविदों के शोध से पता चला है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के उत्खनन में पाई गई मुहरों में अंकित पाठों के स्वरभेद चिन्ह वैसे ही हैं जैसे द्रविड़ परिवार की भाषाओं में मौजूद हैं।
दावे तो ये भी हैं कि इस परिवार की भाषाओं में से एक गोंडी की सहायता से ही सिंधु घाटी की सभ्यता के कई अंकित पाठों को पढ़ने में मदद मिली।
अब इसी गोंडी के प्रचार-प्रसार की दिशा में एक पहल हुई है। इसके शुरुआती क़दम में पूर्वी और मध्य भारत के कई राज्यों से इस भाषा के साहित्यकार दिल्ली में जमा हुए हैं और इस भाषा का शब्दकोष तैयार कर रहे हैं।
क्या है पूरी कहानी पढ़िए
दिल्ली के राजघाट पर जमा गोंडी समुदाय के लोग पिछले कई दिनों से मशक़्क़त कर रहे हैं। कई राज्यों से यहाँ जमा होने वाले इन लोगों का प्रयास है कि गोंडी भाषा का अपना एक शब्दकोष तैयार किया जाए। राजघाट पर गोंडी भाषा के मानकीकरण का काम चल रहा है।
गोंडी भाषा में संचालित रेडियो स्टेशन 'आदिवासी स्वर' के शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं कि एक बड़ी आबादी द्वारा बोली जाने वाली गोंडी दरअसल भाषा के रूप में विकसित नहीं हो पाई है।
उनका कहना है कि भाषा के आधार पर कई राज्य बने हैं। मगर कई राज्यों में फैले गोंडी बोलने वाले लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। क्लिक करें न भाषा को संरक्षित करने का काम हुआ और ना ही विकसित करने का।
शिलालेख पढ़ने में मदद
हालांकि यह काम सरकार को करना चाहिए था, मगर सीजी नेट-स्वर जैसे मोबाइल पत्रकारिता के संस्थान ने गोंडी भाषा के लेखकों और साहित्यकारों को एक मंच पर लाने का काम किया है।
इन्ही में से एक लालसू सुमन नोगोटी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के रहने वाले हैं। नोगोटी कहते हैं कि भाषा पर शोध करने वालों ने पता लगाया है कि द्रविड परिवार की होने के बावजूद, गोंडी में जो स्वरभेद हैं वो अन्य द्रविड भाषाओं से अलग हैं।
प्रकाश रामदेव राव सलामे पेशे से इंजीनियर हैं। वह अकोला के रहने वाले हैं और ताप विद्युत इकाई में कार्यरत हैं। गोंडी भाषा के विकास के लिए एक लंबे अरसे से संघर्ष भी कर रहे हैं।
उनका दावा है कि सिंधु घाटी की सभ्यता से उत्खनन में जो सिक्के या शिलालेख बरामद किये गए, गोंडी भाषा की सहायता से ही उन्हें पढ़ने में मदद मिल पाई।
मातृ भाषा में शिक्षा
सलामे को दुख है कि इतनी बड़ी आबादी गोंडी बोलती है मगर उनके बच्चों को अपनी क्लिक करें मातृ भाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है।
गोंडी भाषा के लिए काम कर रहे लोगों को भारत सरकार के आदिवासी मामलों के विभाग से आस बंधी है क्योंकि भाषा के मानकीकरण के दौरान विभाग के मंत्री जुएल उरांव ने आकर उनसे मुलाक़ात की।
मंत्री ने आश्वासन भी दिया कि भाषा के मानकीकरण के बाद उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की पहल की जाएगी।