भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को जैसे बनारस में नामांकन के लिए 45 मिनट तक इंतजार करना पड़ा, उसी तरह 1998 में मोदी की कार दिग्विजय सिंह का काफिला निकालने के लिए एक थानेदार ने रोक दी थी। उस समय मोदी भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री थे।
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यह तथ्य पत्रकार दीपक तिवारी ने अपनी किताब ‘राजनीतिनामा मध्य प्रदेश’ में उजागर की है।
दीपक तिवारी ने अपनी किताब में 1956 से 2003 तक के मध्य प्रदेश की राजनीति के दिलचस्प किस्सों का संग्रहण किया है।
मोदी की कार को रोका
नरेंद्र मोदी के बारे में दो-तीन दिलचस्प किस्सों में से एक यह है कि मोदी 1998 में भोपाल हवाई अड्डे पर पहुंचे। पार्टी ने उन्हें लेने के लिए दो एंबेसेडर भेजीं।
जब उनकी गाड़ी हमीदिया चौराहा पहुंची, तब थानेदार ने उनकी गाड़ी खड़ी कर दी। साथ वाले नेता समझाने लगे कि राष्ट्रीय महामंत्री और म.प्र. के भाजपा प्रभारी नरेंद्र मोदी गाड़ी में बैठे हैं। उन्हें जाने दें। थानेदार अड़ गया।
मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का काफिला वहां से गुजरने वाला था। किताब में उल्लेख किया गया है,‘मोदी की गाड़ी का ड्राइवर उतरकर थानेदार को धमकाने लगा। थानेदार साहब कुछ दिन इंतजार करो आपको पता चल जाएगा। यह इंतजार पांच साल का हो गया, क्योंकि 1998 के चुनावों में दिग्विजय सिंह ने अप्रत्याशित रूप से सरकार बना ली थी।’
वरिष्ठों ने कर दिया फेल
मोदी का ही एक और किस्सा 1998 के चुनावों का दिया गया है, जिसमें बताया गया है कि मोदी का मध्य प्रदेश आना भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को पसंद नहीं आया था।
उन्होंने ऐसे टिकट दिए कि भाजपा सरकार बनाने में विफल हो गई। मोदी तब तक सफलता के पर्याय माने जाते थे। लेकिन मध्य प्रदेश में विफल हो गए। तिवारी ने लिखा है, ‘नरेंद्र मोदी मध्य प्रदेश आए तो कार्यकर्ताओं में जोश भर गया, क्योंकि इतिहास था कि नरेंद्र मोदी जहां भी प्रभारी रहे थे, वहां भाजपा ने सरकार बनाई थी। गुजरात और हिमाचल में वे प्रभारी थे और वहां भाजपा की सरकार बनी थी।’
वरिष्ठ नेताओं ने नरेंद्र मोदी को उस समय मध्य प्रदेश में विफल करा दिया था। तिवारी ने लिखा है, ‘नरेंद्र मोदी मध्य प्रदेश आए तो यहां ठाकरे से जुड़े नेताओं पटवा (सुंदरलाल पटवा) और मोघे (कृष्णमुरारी मोघे) को यह पसंद नहीं आया। इन लोगों ने ठाकरे से शिकायत की कि जब मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बन ही रही है तो मोदी के सिर जीत का सेहरा क्यों बांधना। सुंदरलाल पटवा कहते हैं कि बाहर का आदमी मध्य प्रदेश में आकर क्या कर सकता था।’
भाषण देकर उठ जाते थे मोदी
तिवारी ने लिखा है, ‘नरेंद्र मोदी उस समय प्रदेश के नेताओं के अघोषित बॉयकाट के शिकार थे। वे अपने आपको अछूत जैसा महसूस करते थे।
नरेंद्र मोदी अपने व्यवहार के कारण आंख की किरकिरी रहते थे। वे बैठकों में अपना भाषण देकर उठ जाते थे और दूसरों को नहीं सुनते थे। इसका बड़ा विरोध होता था। उन दिनों भी नरेंद्र मोदी अपने पूरे लाव लश्कर के साथ चलते थे।
उनके साथ अपने चार-पांच सेवकों की टीम थी। जो उनके इर्द गिर्द होती थी। उनके साथ के लड़के पूरे समय उनकी सुख सुविधाओं का ख्याल रखते थे।’
तिवारी ने किताब में लिखा है कि इसका बदला फिर मोदी ने अपेक्षाकृत नौजवान नेता गौरीशंकर शेजवार को नेता प्रतिपक्ष बनाकर लिया। तिवारी के मुताबिक, ‘नेता प्रतिपक्ष पर अंदरूनी विवाद बढ़ता देख नरेंद्र मोदी ने भोपाल आकर डेरा डाल दिया था।
मोदी को विधानसभा चुनावों के दौरान वरिष्ठ नेताओं द्वारा की गई अपनी दुर्दशा याद थी। वे अब नए चेहरों को आगे लाने के नाम पर तमाम पुराने नेताओं को दरकिनार करवा देने पर आमादा थे। प्रतिपक्ष के नेता का यह चुनाव भाजपा में बड़ा रोचक था। जहां सुंदरलाल पटवा स्वयं नेता प्रतिपक्ष बनना चाहते थे। वहीं भाजपा के राष्ट्रीय संसदीय बोर्ड ने डॉ. गौरीशंकर शेजवार के पक्ष में फैसला किया। शेजवार उम्र में कनिष्ठ थे लेकिन संसदीय जीवन में बाबू लाल गौर के बराबर थे।’
शेजवार को नेता प्रतिपक्ष बनाकर एक तरह से मोदी ने वरिष्ठ नेताओं की इस ब्रिगेड से अपना बदला ले लिया था। तिवारी के मुताबिक, ‘जब इस फैसले (शेजवार को नेता प्रतिपक्ष चुनने) की खबर भोपाल पहुंची तो स्थानीय नेताओं ने इसे मानने से इनकार कर दिया। पार्टी संविधान का हवाला देकर चुनाव कराने पर जोर दिया गया। मतदान हुआ और शेजवार, बाबूलाल गौर की तुलना में बहुमत पाकर जीत गए।’