देश में कुपोषण को मात देने के दावों के बीच मध्य प्रदेश का दतिया जिला एक बार फिर कठघरे में है। बालाघाट में 19 बच्चों की मौत के बाद अब दतिया के सलैया पमार आदिवासी डेरा से एक और बड़ी खबर सामने आई है। यहां 16 महीने की मासूम नीलू ने कुपोषण और लापरवाही के बीच दम तोड़ दिया। विडंबना यह है कि इसी दतिया को वर्ष 2022 में कुपोषण पर नवाचार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों सम्मान मिल चुका है।
उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती हुई थई मासूम
जानकारी के अनुसार, नीलू को 10 अगस्त को उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस समय उसका वजन केवल 5.2 किलो दर्ज किया गया। जबकि 16 महीने की बच्ची का औसत वजन लगभग 10 किलो होना चाहिए। अस्पताल में कुछ दिन उपचार के बाद उसकी हालत में सुधार बताया गया और परिजन सोमवार को उसे घर ले आए। लेकिन घर पहुंचते ही बच्ची की हालत फिर बिगड़ गई और कुछ ही घंटों में उसने अंतिम सांस ली।
बच्ची की मौत के बाद भी गांव नहीं पहुंची स्वास्थ्य टीम
सबसे बड़ा सवाल यह है कि दस्तक अभियान चलने के बावजूद बच्ची की मौत की सूचना के बाद भी स्वास्थ्य विभाग की कोई टीम गांव नहीं पहुंची। मंगलवार दोपहर करीब 3:15 बजे जब गांव का उपस्वास्थ्य केंद्र देखा गया तो उस पर ताला लटका मिला। इससे जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
डेरा में छह बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में
सलैया पमार डेरा की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां छह बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में हैं। मंगलवार को गांव पहुंची टीम को 3 अतिकुपोषित बच्चे घरों में मिले। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पिस्ता आदिवासी ने बताया कि सबसे बड़ी दिक्कत परिजनों की सोच है। मजदूरी छूटने के डर से लोग अपने बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र यानी एनआरसी में भर्ती नहीं कराना चाहते। समझाने पर कई बार विवाद तक हो जाता है। खुद कार्यकर्ता का अपना बच्चा भी कुपोषण के कारण एनआरसी में भर्ती है।
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70 बच्चों में सिर्फ 20 का डेटा अपडेट
आंगनबाड़ी केंद्र में कुल 70 बच्चे पंजीकृत हैं, लेकिन पोषण ट्रैकर एप पर केवल 20 बच्चों का ही डेटा अपडेट है। कार्यकर्ता का कहना है कि शेष बच्चों के पास समग्र आईडी और आधार कार्ड नहीं हैं। इसी वजह से उन्हें पूरक पोषण आहार नहीं मिल पा रहा है। इस संबंध में विभाग को लिखित शिकायत भी दी जा चुकी है। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं का टेक होम राशन भी पिछले 5 महीनों से नहीं आया है। पोषण और स्वास्थ्य, दोनों मोर्चों पर डेरा के लोग बेबस हैं।
कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश
मामला सामने आने के बाद हरकत में आए बीएमओ डॉ. राहुल चऊदा ने कहा कि तुरंत मेडिकल टीम गांव भेजी जाएगी। सभी अतिकुपोषित बच्चों की स्क्रीनिंग कर उन्हें एनआरसी में भर्ती कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। वहीं, कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने पूरे प्रकरण की जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
2022 में कुपोषण नियंत्रण के लिए मिला था सम्मान
वर्ष 2022 में कुपोषण नियंत्रण के नवाचार के लिए सम्मानित होने वाला दतिया आज फिर सवालों में है। सरकारी योजनाएं, एप और अभियान सब कागज पर चलते दिखते हैं, लेकिन धरातल पर सलैया पमार जैसे डेरे आज भी बुनियादी स्वास्थ्य, पोषण और निगरानी से वंचित हैं। नीलू की मौत सिर्फ एक बच्ची की मौत नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है, जो रिपोर्ट में तो कुपोषण नियंत्रण के दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर जरूरतमंद बच्चों तक समय पर स्वास्थ्य और पोषण सेवाएं पहुंचाने में नाकाम नजर आती है।