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दमोह: तेंदूखेड़ा में निजी जमीन पर बना डाला 1.35 करोड़ का एसडीएम दफ्तर, अब दोषियों की जेब से होगी वसूली

Thu, 01 Oct 2026 04:42 PM IST
दमोह ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह

सार

तेंदूखेड़ा में करीब 1.35 करोड़ रुपये से बन रहा एसडीएम कार्यालय भवन निजी जमीन पर शुरू कराने के बाद प्रशासन ने निर्माण रोक दिया है। अब जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच और लापरवाही साबित होने पर सरकारी राशि की वसूली के निर्देश दिए गए हैं।
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कलेक्टर ने जांच कर दिए वसूली के निर्देश - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जिले के तेंदूखेड़ा में सरकारी निर्माण व्यवस्था की निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। यहां करीब एक करोड़ 35 लाख रुपये की लागत से स्वीकृत एसडीएम कार्यालय भवन का निर्माण निजी कृषि भूमि पर शुरू करा दिया गया। आरोप है कि निर्माण शुरू करने से पहले भूमि के स्वामित्व, खसरा-नक्शा, एनओसी और अन्य जरूरी दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं की गई।

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मामला जमीन की मालकिन की शिकायत से शुरू होकर हाईकोर्ट जबलपुर तक पहुंचा। इसके बाद प्रशासन ने मामले में कार्रवाई तेज की। कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने विवादित भूमि पर निर्माण और किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर रोक लगाते हुए संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही निर्माण में खर्च हुई शासकीय राशि की जांच कर दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों से ही वसूली के निर्देश दिए गए हैं।

निजी जमीन पर बन रहा था सरकारी भवन
मामला तेंदूखेड़ा के खसरा नंबर 170, रकबा 0.2590 हैक्टेयर भूमि से जुड़ा है। उपलब्ध राजस्व अभिलेखों के अनुसार यह जमीन निजी भू-स्वामी के नाम दर्ज बताई गई है। इसी भूमि पर एसडीएम कार्यालय के नए भवन का निर्माण शुरू कराया गया। मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि शासकीय भवन के निर्माण के लिए भूमि का चयन करते समय उसके स्वामित्व और राजस्व रिकॉर्ड का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। सरकारी भवन के निर्माण से पहले भूमि की वैधानिक स्थिति सुनिश्चित करना जरूरी था, लेकिन आरोप है कि आवश्यक दस्तावेजों और एनओसी की जांच किए बिना ही निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई।
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हाईकोर्ट पहुंचा मामला
मामले में भूमि स्वामिनी ने 3 दिसंबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय में शिकायत देकर निजी भूमि पर निर्माण कराए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई थी। शिकायत के बाद भी अपेक्षित निराकरण नहीं होने पर उन्होंने हाईकोर्ट जबलपुर का दरवाजा खटखटाया और याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 10 मार्च 2026 को कलेक्टर को मामले का निर्धारित समय-सीमा में निराकरण करने के निर्देश दिए। इसके बाद मामला अवमानना याचिका तक पहुंचा। अवमानना की कार्रवाई के बाद जिला प्रशासन ने राजस्व प्रकरण में सुनवाई कर मामले का निराकरण करने की प्रक्रिया तेज की और सुनवाई के बाद कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने 12 अगस्त को स्पीकिंग ऑर्डर जारी किया। इसके बाद 27 अगस्त को विवादित भूमि और निर्माण से जुड़े मामले में आगे की कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

आदेश के अनुसार निजी भूमि पर किसी भी प्रकार के निर्माण या हस्तक्षेप पर रोक लगाने के साथ ही संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। मामले में निर्माण प्रक्रिया से जुड़े तत्कालीन कार्यपालन यंत्री, एसडीओ, उपयंत्री/सब-इंजीनियर और संबंधित पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की भूमिका सवालों के घेरे में है। कलेक्टर ने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव को भेजने के निर्देश दिए हैं।

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प्रशासन की कार्रवाई का केंद्र यह है कि आखिर सरकारी भवन के निर्माण के लिए निजी भूमि का चयन कैसे हुआ और निर्माण शुरू होने से पहले भूमि के स्वामित्व एवं जरूरी दस्तावेजों का सत्यापन क्यों नहीं किया गया। निजी भूमि पर निर्माण शुरू होने के कारण निर्माण कार्य में अब तक खर्च हुई शासकीय राशि भी जांच के दायरे में आ गई है। प्रशासन ने निर्माण पर खर्च हुई राशि की जांच कराने और यदि अधिकारियों की लापरवाही के कारण शासन को वित्तीय नुकसान हुआ है तो जिम्मेदारी तय कर दोषी अधिकारियों से राशि की वसूली करने के निर्देश दिए हैं। यानी मामला सिर्फ निजी जमीन पर सरकारी भवन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी धन के इस्तेमाल की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।

पीआईयू की जवाबदेही पर भी सवाल
मामले में पीआईयू की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सरकारी भवन के निर्माण की प्रक्रिया में भूमि की उपलब्धता, निर्माण स्थल और संबंधित दस्तावेजों की जांच जैसी प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण होती हैं। अब जांच में यह सामने आना बाकी है कि निर्माण शुरू होने से पहले भूमि संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन किस अधिकारी ने किया था और निर्माण के लिए स्थल को किस आधार पर स्वीकृत किया गया था।

अब चिन्हित शासकीय भूमि पर बनेगा कार्यालय
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि तेंदूखेड़ा का नया एसडीएम कार्यालय भवन अब नियमानुसार चिन्हित शासकीय भूमि पर ही बनाया जाएगा। निर्माण कार्य को निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाने और भवन को तय समय-सीमा में पूरा कराने के निर्देश भी दिए गए हैं। मामले से जुड़े आदेश की प्रतियां आयुक्त भू-संसाधन, प्रमुख सचिव राजस्व और प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग को भेजी गई हैं।
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एक निर्माण ने खोल दी पूरी व्यवस्था की पोल
तेंदूखेड़ा का यह मामला सरकारी निर्माण कार्यों में भूमि चयन, दस्तावेजों के सत्यापन और विभागीय निगरानी की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सबसे अहम सवाल यही है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन निजी थी तो सरकारी भवन का निर्माण शुरू होने से पहले इसका पता क्यों नहीं चला। फिलहाल प्रशासन ने निजी भूमि पर निर्माण रोक दिया है और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई तथा शासकीय राशि की वसूली की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।

 

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