दिग्विजय सिंह(दिग्गी राजा) पर आरोप का असर नहीं होता। अगर कोई उनके सामने कह दे कि आपके चलते कांग्रेस की नाव डूब रही है, तो अपनी चिरपरिचित मुस्कान के अलावा वह कोई और प्रतिक्रिया नहीं देते। दिग्विजय सिंह के बारे में यह भी आम है कि पिछले कई साल से उन्हें जो करना है, वह करते हैं। वह इसके लिए पार्टी के भीतर किसी की अनुमति का इंतजार नहीं करते। मध्यप्रदेश में चुनाव से कुछ महीने पहले उन्हें नर्मदा यात्रा करनी थी तो पत्नी के साथ उन्होंने इसे पूरा किया। एक बात और दिग्विजय सिंह कोई काम बिना सोच विचार किए नहीं करते।
सिंह की एक खासियत और है। वह मीडिया से संतुलित रिश्ता रखते हैं। जल्दी झल्लाते नहीं और सवाल-जवाब के दौरान सामने वाले को पूरा अवसर देते हैं। कड़ी और बड़ी बात को सहजता से कह जाते हैं। दिग्विजय सिंह के व्यंग्य भी जहर बुझे तीर की तरह होते हैं। उन्हें दिग्गी राजा या फिर कभी मौलाना दिग्गी, मुख्यमंत्री रहने के दौरान जनेऊ पहने पूजा आराधना में व्यस्त दिग्गी, संघ को आड़े हाथों लेने में परहेज न करने वाले दिग्गी जैसे कई रूपों में देखा गया है। वह यूपीए सरकार के समय केन्द्रीय मंत्री चिदंबरम के नक्सलवाद पर सवाल उठा चुके हैं तो कई बार अपनी सरकार के कामकाज को लेकर टीका टिप्पणी की है।
दस साल तक ठसक के साथ राज
दिग्विजय सिंह 1993 में पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। 1998 का चुनाव भी उन्होंने पूरी ठसक के साथ जीता और दस साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 2003 का चुनाव कांग्रेस हार गई और दिग्विजय सिंह ने संकल्प लिया था कि यदि पार्टी, चुनाव हार गई तो वह कोई पद नहीं लेंगे। दिग्विजय सिंह ने अपनी तरफ से इसकी पूरी कोशिश की। 71 साल के दिग्विजय सिंह इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। राजनीति की कुछ बारीकियां उन्होंने प्रदेश के दिवंगत नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह से सीखी हैं। 1980 में अर्जुन सिंह की सरकार में वह मंत्री भी बने थे।
सिंह की सबसे बड़ी खासियत है कि वह किसी के नाराज हो जाने की बहुत परवाह नहीं करते। इसके अलावा वह होमवर्क पर पूरा भरोसा रखते हैं। राजनीति में भी उनके पास एक टीम है। यह टीम हमेशा विभिन्न मुद्दों पर काम करती रहती है। दिग्विजय सिंह के एक पुराने दफ्तरी के मुताबिक वह लगातार फीडबैक लेते रहते हैं। याद्दाश्त के बारे में भी कहा जाता है कि वह जिसका एक बार चेहरा देख लेते हैं, उसे काफी हद तक स्कैन कर लेते हैं।
गुब्बारे की हवा निकालने के मास्टर
मुंबई में उत्तर भारतीयों पर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का हमला याद कीजिए। तब बिहार के मुंबई में रहने वाले लोगों पर बन आई थी। वह दिग्विजय सिंह ही थे, जिन्होंने ठाकरे परिवार को बिहार से जाकर मुंबई में बसने वाला बताया था। काफी हंगामा मचा और अंत में ठाकरे परिवार को यह सच स्वीकार करना पड़ा।
बाबा रामदेव को भी याद कीजिए। दिग्विजय सिंह के यूपीए-2 सरकार के समय में दिए गए बयान को याद कर लीजिए। दिग्विजय सिंह ने रामदेव के संन्यासी होने पर सवाल उठाया था और उन्हें कारोबारी बाबा बताया था। बाबा रामदेव के पीछे भाजपा और संघ का हाथ भी बताया था। अन्ना हजारे के आंदोलन और केजरीवाल को लेकर भी दिग्विजय सिंह ने बयान दिया था। एक बयान आज भी बदल-बदलकर आता है-खाता न बही, जो केजरी कहें वही सही। यह दिग्विजय सिंह का कटाक्ष था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 'फेंकू' दिग्विजय सिंह ने ही कहा था। मुंबई में आतंकी हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे पर बयान, बटला हाऊस मुठभेड़ पर बयान देकर भी दिग्विजय सिंह ने मीडिया में लगातार अपनी जगह बनाए रखी। हालांकि उनके तमाम बयानों पर कांग्रेस पार्टी ने किनारा कर लिया। उनके निजी बयान बताए गए। बयानों के लिए उनकी खूब आलोचना भी हुई। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश समेत कई प्रदेशों के वह प्रभारी भी बनाए गए। जहां भी प्रभारी बने वहां कांग्रेस का जनाधार कोई खास नहीं बढ़ पाया। उनकी बयानों के लिए जमकर आलोचना हुई, लेकिन वह अपने राजनीतिक अभियान में डटे रहे।