शाम की दूसरी प्रस्तुति प्रख्यात ओडिसी नृत्यांगना शाश्वती गराई घोष के ओडिसी नृत्य की थी। खजुराहो के मंच पर उन्होंने "जय देवा हरे" नृत्य रचना से अपने नृत्य की शुरुआत की। कृष्ण कहें या भगवान विष्णु अथवा राम उन्हीं का महिमा गान इस प्रस्तुति की भावभूमि में था। वास्तव में यह एक शुभ नृत्य था जो हमारी चेतना के साथ प्रतिध्वनित होता है। नृत्य रचना खुद शाश्वती की गढ़ी हुई थी। संगीत निर्देशन सृजन चटर्जी का था। उनकी दूसरी नृत्य रचना माया मानव की थी।
विश्वनाथ खुंटीया द्वारा लिखित विचित्र रामायण से ली गई मृग मारीच या सुनहरे हिरण की कथा को शाश्वती ने ओडिसी के नृत्यभावों से बड़े ही सहज ढंग से पेश किया। इस प्रस्तुति के जरिए शाश्वती ने यह दिखाने की कोशिश की है कि माया इंसान को इस कदर जकड़ लेती है कि वह चाह कर भी नहीं छूट पाता। इस प्रस्तुति में नृत्य संयोजन शर्मिला विश्वास का था, जबकि संगीत रचना रमेशचंद्र दास और विजयकुमार बारिक की थी। नृत्य का समापन उन्होंने निर्वाण से किया। इस प्रस्तुति में पखावज पर विजयकुमार बारिक, गायन पर राजेश कुमार लेंका, वायलिन पर रमेश चंद दास एवं बांसुरी पर परसुरामदास ने साथ दिया।
नृत्य देख कर मोहित हुए दर्शक
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नृत्य सभा का समापन बाला विश्वनाथ और प्रफुल्ल सिंह गेहलोत के भरतनाट्यम और कथक नृत्य की जुगलबंदी से हुआ। बाला भरतनाट्यम करती हैं और प्रफुल्ल कथक। इस प्रस्तुति में दोनों नृत्यानुशासनों के 16 कलाकारों ने भागीदारी की। समूह ने भगवान विष्णु के दशावतारों पर अपनी नृत्य प्रस्तुति दी। कन्नड़ ओर संस्कृत की रचनाओं पर भरतनाट्यम औऱ कथक के विभिन्न नृत भावों और आंगिक अभिनयों से दोनों की विष्णु के अवतारों को साकार करने की कोशिश सफल हुई। इसमे जहां कथक के तोड़े टुकड़ों का इस्तेमाल किया गया तो वहीं भरतनाट्यम की पल्लवी का भी इस्तेमाल देखने को मिला। यह प्रस्तुति भी खूब सराही गई।