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भोपाल मास्टर प्लान पर बवाल क्यों?: किसान-व्यापारी नाराज,गांवों की जमीन और कैचमेंट के नियमों पर सवाल,दी चेतावनी

Fri, 23 Oct 2026 06:15 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल

सार

भोपाल मास्टर प्लान-2047 के ड्राफ्ट के खिलाफ किसानों और व्यापारियों ने टीएनसीपी कार्यालय में आपत्तियां दर्ज कराईं। किसान 66 गांवों की कृषि भूमि, बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र और निर्माण नियमों में बदलाव का विरोध कर रहे हैं। व्यापारियों ने कन्वर्जन फीस कुल 5% करने और पूरा व्यावसायिक एफएआर देने की मांग की है। 
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भोपाल व्यापारी संघ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भोपाल के मास्टर प्लान-2047 का ड्राफ्ट अब किसानों और व्यापारियों के विरोध के घेरे में है। शुक्रवार को दोनों वर्गों ने शाहपुरा स्थित नगर तथा ग्राम निवेश (टीएनसीपी) कार्यालय पहुंचकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। किसानों की चिंता खेती की जमीन के भविष्य और बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र में निर्माण संबंधी प्रावधानों को लेकर है, जबकि व्यापारियों ने कन्वर्जन फीस, व्यावसायिक भू-उपयोग, एफएआर और सीलिंग की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। भारतीय किसान संघ के बैनर तले पहुंचे किसानों ने उपसंचालक हरिओम माहेश्वरी को ज्ञापन सौंपा। किसानों ने चेतावनी दी कि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ दोबारा टीएनसीपी कार्यालय पहुंचकर धरना देंगे। दूसरी ओर, व्यापारियों ने कन्वर्जन फीस एकमुश्त कुल 5% तय करने और फीस जमा करने पर पूरा व्यावसायिक एफएआर देने की मांग रखी।
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व्यापारियों की मांग- कन्वर्जन फीस कुल 5% हो
किसानों से पहले व्यापारी भी टीएनसीपी कार्यालय पहुंचकर आपत्तियां दर्ज करा चुके हैं। उनकी प्रमुख मांग है कि जमीन का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए कन्वर्जन फीस एकमुश्त और कुल 5% तय की जाए। फीस जमा करने के बाद पूरा व्यावसायिक एफएआर दिया जाए और पुराने बाजारों को राहत मिले। व्यापारियों ने व्यावसायिक भू-उपयोग, एफएआर और सीलिंग की कार्रवाई से जुड़े प्रावधानों पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि मास्टर प्लान के नियम ऐसे होने चाहिए, जिनसे पुराने बाजारों और कारोबारियों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।
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66 गांवों की जमीन के इस्तेमाल पर किसानों की चिंता
किसानों का कहना है कि मास्टर प्लान के प्रस्ताव में 66 गांवों की कृषि भूमि को रिवरफ्रंट, फॉरेस्ट, ग्रीन बेल्ट और अन्य आरक्षित श्रेणियों में शामिल करने की बात है। इससे खेती, निजी जमीन के उपयोग और आजीविका पर असर पड़ने की आशंका है। जनपद पंचायत अध्यक्ष फंदा प्रमोद सिंह राजपूत ने ड्राफ्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि अधिकारी गड़बड़ी कर रहे हैं और वे मास्टर प्लान के खिलाफ हैं। सरपंच प्रतिनिधि घनश्याम पाटीदार ने आरोप लगाया कि मास्टर प्लान में शामिल गांवों के सरपंचों को बैठकों में नहीं बुलाया गया। किसान चाहते हैं कि कृषि भूमि का भू-उपयोग बदलने से पहले प्रभावित किसानों और पंचायतों की आपत्तियों पर विचार किया जाए। उनका कहना है कि खेती उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है, इसलिए जमीन के इस्तेमाल में बदलाव का सीधा असर उनके भविष्य पर पड़ेगा।

बड़े तालाब के कैचमेंट में निर्माण नियमों पर सवाल
किसानों ने बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र में निर्माण संबंधी प्रावधानों पर भी आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि आम लोगों के मकानों वाले क्षेत्रों में निर्माण पर सख्ती है, जबकि कुछ अन्य इलाकों में निर्माण की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है। विरोध करने वालों ने एलडीआर में शामिल क्षेत्रों में निर्माण की अनुमति पांच गुना तक बढ़ाने के प्रावधान पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि इससे प्रभावशाली लोगों के बंगलों और फार्म हाउस वाले क्षेत्रों को फायदा मिल सकता है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित भू-उपयोग नियमों, निर्माण अनुमतियों और जमीन के रिकॉर्ड का मिलान जरूरी है। किसानों के मुताबिक, वर्ष 1995 के मास्टर प्लान में संबंधित जमीनों का उपयोग कृषि के लिए निर्धारित था। उनका यह भी कहना है कि पूर्व में निरस्त किए गए 2031 के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में कृषि उपयोग का प्रावधान था। अब नए ड्राफ्ट में बदलाव की आशंका ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। किसान भोजताल संरक्षण जोन-1 और जोन-2 को हटाने तथा कृषि भूमि का उपयोग कृषि के लिए ही सुरक्षित रखने की मांग कर रहे हैं। किसान गीता प्रसाद पाटीदार ने चेतावनी दी कि मांगें नहीं मानी गईं तो किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ टीएनसीपी कार्यालय के सामने धरने पर बैठेंगे।


मेंडोरी की गाइडलाइन एक साल में तीन गुना
किसानों की आपत्तियों के बीच मेंडोरा, मेंडोरी, सेवनिया गौंड और केरवा वुड्स जैसे क्षेत्रों की जमीनों का भू-उपयोग और कलेक्टर गाइडलाइन भी चर्चा में है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मेंडोरी गांव के केरवा वुड्स क्षेत्र में कृषि भूमि की कलेक्टर गाइडलाइन वर्ष 2025-26 में एक करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर थी, जो वर्ष 2026-27 में बढ़कर तीन करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर हो गई। यह सरकारी गाइडलाइन में दर्ज मूल्य है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य या बिक्री की कीमत भी इसी अनुपात में बढ़ गई है। किसान इन क्षेत्रों में भू-उपयोग और निर्माण नियमों को लेकर स्पष्टता चाहते हैं।

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कैचमेंट क्षेत्र के मकानों पर भी उठ रहे सवाल
उपलब्ध आंकड़ों के हवाले से कैचमेंट क्षेत्र में कृषि उपयोग वाली श्रेणी के करीब 40 हजार मकानों और लगभग तीन लाख आबादी का मुद्दा भी उठाया जा रहा है। दावा है कि ड्राफ्ट के प्रावधानों से इन मकानों की वैधानिक स्थिति पर सवाल खड़े हो सकते हैं। हालांकि, सभी मकानों को अवैध मानने या उन पर कार्रवाई होने की स्थिति की पुष्टि संबंधित नियमों और रिकॉर्ड की जांच के बिना नहीं की जा सकती। किसानों और प्रभावित लोगों की मांग है कि प्रशासन कैचमेंट क्षेत्र में मौजूदा मकानों की स्थिति और प्रस्तावित नियमों के प्रभाव को स्पष्ट करे, ताकि लोगों को अपने घरों और जमीन के भविष्य को लेकर अनिश्चितता न रहे।

आपत्तियों पर सुनवाई के लिए बुलाए जाएंगे संबंधित पक्ष
टीएंडसीपी की संयुक्त संचालक इंदू त्रिपाठी के मुताबिक, नियमानुसार ड्राफ्ट पर 30 दिन के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए हैं। प्राप्त आपत्तियों को ऑनलाइन पोर्टल पर डिजिटाइज किया जाएगा। इसके बाद संबंधित पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया जाएगा। अब निगाहें इस बात पर हैं कि किसानों और व्यापारियों की आपत्तियों पर सुनवाई के दौरान क्या निर्णय होते हैं और मास्टर प्लान-2047 के अंतिम स्वरूप में किन प्रावधानों में बदलाव किया जाता है।


 
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