फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ओबीसी आरक्षण पर सवर्ण समाज की एंट्री: पार्टियों के सुप्रीम कोर्ट जाने से नाराज,यूपी चुनाव में विरोध की चेतावनी

Wed, 14 Oct 2026 04:24 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल

सार

मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 27 से घटाकर 14 प्रतिशत किए जाने के हाईकोर्ट के फैसले के बाद परशुराम सेवा संगठन के प्रदेश अध्यक्ष सुनील पांडे ने सवर्ण समाज को एकजुट करने और सरकार व कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक विरोध की चेतावनी दी है। संगठन ने उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश के आगामी चुनावों में वोट के जरिए जवाब देने की बात कही है।
विज्ञापन
ओबीसी आरक्षण - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

 मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब सवर्ण समाज की ओर से भी राजनीतिक विरोध के संकेत मिलने लगे हैं। परशुराम सेवा संगठन के प्रदेश अध्यक्ष सुनील पांडे ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार या कांग्रेस ने सवर्ण समाज के हितों के खिलाफ कदम उठाए, तो संगठन सड़क पर उतरकर विरोध करेगा और चुनाव में वोट के जरिए जवाब देगा। उन्होंने उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव के साथ मध्य प्रदेश में होने वाले आगामी चुनावों में भी सवर्ण समाज को एकजुट करने की बात कही है। यह विवाद अब सिर्फ आरक्षण के प्रतिशत तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की मांग और हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ सवर्ण संगठनों ने अपने हितों और राजनीतिक भागीदारी का सवाल उठाना शुरू कर दिया है।
विज्ञापन


हाईकोर्ट के फैसले के बाद क्यों बढ़ा विवाद?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में ओबीसी का आरक्षण 27 प्रतिशत करने वाले 2019 के संशोधन को असंवैधानिक ठहराते हुए 14 प्रतिशत आरक्षण को ही मान्य माना। अदालत ने कहा कि आरक्षण की कुल 50 प्रतिशत सीमा पार करने के लिए असाधारण परिस्थितियों का पर्याप्त आधार नहीं मिला। साथ ही, विवाद के कारण रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर तीन महीने के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए। यह आरक्षण कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में 2019 में 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। बाद में भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी यह मामला कानूनी विवाद में उलझा रहा। हाईकोर्ट के ताजा फैसले के बाद बीजेपी और कांग्रेस ने 27 प्रतिशत आरक्षण की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ने की बात कही है। वहीं, ओबीसी संगठनों की ओर से भी आगे की कानूनी लड़ाई की तैयारी की जा रही है। पांडे ने कहा कि गरीब किसी एक जाति या वर्ग में नहीं होता। ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर, यादव और अहीरवार सहित हर समाज में गरीब परिवार हैं। इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की समस्याओं को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए। उन्होंने आरक्षण और राजनीतिक भागीदारी के सवाल पर सरकारों की नीतियों पर सवाल उठाए।

भागीदारी ज्यादा है तो सीमा पर भी निभाएं जिम्मेदारी
सुनील पांडे ने अपने बयान में कहा कि यदि किसी वर्ग की भागीदारी ज्यादा है तो उसे जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने राजपूत और गोरखा ब्रिगेड का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि यदि ओबीसी की भागीदारी अधिक है तो सीमा पर देश की रक्षा में भी उनकी भागीदारी उसी अनुरूप क्यों नहीं होनी चाहिए। उनका यह बयान आरक्षण के मुद्दे को सरकारी नौकरियों और शिक्षा से आगे बढ़ाकर सामाजिक भागीदारी तथा जिम्मेदारियों की बहस से जोड़ता है। हालांकि, सैन्य भर्ती के नियम और आरक्षण की व्यवस्था अलग कानूनी प्रावधानों के तहत संचालित होते हैं। पांडे ने चेतावनी दी कि यदि सरकार या कांग्रेस सवर्ण समाज के खिलाफ कोई कदम उठाती है, तो संगठन इसका राजनीतिक विरोध करेगा। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनाव में सवर्ण समाज की टीम बनाकर जिला स्तर पर लोगों को जागरूक किया जाएगा और वोट के माध्यम से विरोध दर्ज कराया जाएगा। उन्होंने मध्य प्रदेश में आगामी नगर निगम चुनावों के साथ अगले विधानसभा चुनाव में भी इसी तरह का अभियान चलाने की बात कही। पांडे के मुताबिक, संगठन फिलहाल सरकार और राजनीतिक दलों के अगले कदम पर नजर रखेगा। यदि जरूरत पड़ी तो सड़क पर उतरकर आंदोलन भी किया जाएगा।
विज्ञापन


यह भी पढ़ें-एमपी के बीस जिलों में बदलेगा मौसम: दिन में धूप, रात में ठंडक और अब बारिश की बारी, भोपाल-इंदौर में अलर्ट नहीं
विज्ञापन


अब आगे क्या?
ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट के फैसले के बाद मध्य प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के बीच खींचतान बढ़ने के संकेत हैं। कांग्रेस-बीजेपी 27 प्रतिशत आरक्षण के लिए कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाने की बात कह रही है, जबकि सुनील पांडे के बयान से सवर्ण समाज को लामबंद करने की रणनीति सामने आई है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि राज्य सरकार फैसले के अनुपालन और लंबित नियुक्तियों को लेकर क्या कदम उठाती है, ओबीसी पक्ष की कानूनी रणनीति क्या रहती है और सवर्ण संगठन अपनी चुनावी चेतावनी को किस तरह आंदोलन में बदलते हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें