मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त की ताबड़तोड़ छापेमारियां एक बार फिर सुर्खियां बटोर रही हैं, लेकिन, करोड़ों की घूस खाने वालों की गिरफ्तारी नहीं होने से सवाल भी उठ रहे हैं। हाल के छापों में भोपाल के रिटायर्ड पीडब्ल्यूडी इंजीनियर जीपी मेहरा के यहां 17 टन शहद, 36 लाख नकदी, 2.6 किलो सोना, करोड़ों की संपत्ति और इंदौर के रिटायर्ड आबकारी अधिकारी धर्मेंद्र सिंह भदौरिया के पास 10 करोड़ की संपत्ति, 1 करोड़ नकदी और करीब पांच किलो सोना बरामद हुआ। फिर भी, इन मामलों में तत्काल गिरफ्तारी नहीं हुई, जबकि ये दोनों अधिकारी तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं और उनकी गिरफ्तारी में कोई रोड़ा नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या जांच एजेंसियों की प्रभावशीलता में कमी है? क्या कोई कानूनी बाधाएं आड़े आ रही हैं? इससे जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं?
दरअसल, गिरफ्तारी नहीं होने का कारण लोकायुक्त के 23 मई 1994 में प्रशासनिक दिशा निर्देश को बताया जा रहा है, जिसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जांच के घेरे में आने वाले सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की गिरफ्तारी का सामान्य नियम नहीं होना चाहिए, बल्कि विशेष परिस्थितियों में ही गिरफ्तारी की जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि गिरफ्तारी तब हो जब ठोस और उचित सबूत हों, यदि आशंका हो कि आरोपी कर्मचारी जांच में सहयोग नहीं करेगा या सबूतों से छेड़छाड़ करेगा या फिर रिश्वत लेते रंग हाथों पकड़े जाने का मामला हो। अब सवाल यह उठ रहा है कि इन अधिकारियों के पास से करोड़ों रुपये की संपत्तियों का खुलासा हो रहा है। ये सेवानिवृत्त हो गए हैं, यानी अब सरकारी सेवक भी नहीं हैं, फिर भी इनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं की जा रही है? क्या ये सलाखों से बाहर रहकर सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेंगे? दरअसल, तत्कालीन दिग्विजय सरकार का यह आदेश भ्रष्टाचारियों को गिरफ्तारी से बचाने की ढाल बन रहा है।
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केंद्रीय जांच एजेंसियां करती हैं गिरफ्तार
भारतीय न्याय संहिता में सात साल की सजा तक के अपराध में गिरफ्तारी का कारण बताने का प्रावधान है। लोकायुक्त की तरफ से की जा रही आय से अधिक संपत्ति के मामले की कार्रवाई में 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। ऐसे में साफ है कि नए कानून के अनुसार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कोई विशेष कारण भी नहीं बताना है। इसके बावजूद लोकायुक्त की तरफ से गिरफ्तारी की कार्रवाई नहीं की जा रही, जबकि केंद्रीय एजेंसियां आय से अधिक मामले में गिरफ्तारी की भी कार्रवाई करती हैं।
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लोकायुक्त ने 238 ट्रैप कार्रवाइयां कीं
2024-25 में लोकायुक्त ने 238 ट्रैप कार्रवाइयां कीं, जिनमें छोटे कर्मचारी (जैसे पंचायत कर्मी, क्लर्क) रिश्वत लेते पकड़े गए और गिरफ्तार हुए। लेकिन बड़े अधिकारियों (IAS, वरिष्ठ इंजीनियर) के मामले जटिल होने से जांच लंबी खिंचती है। उदाहरण के लिए, 2022-24 में 137 छापों में ज्यादातर छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई।
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सेवा काल में
कार्रवाई नहीं होने पर उठ रहे सवाल
पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर जीपी मेहरा 2025 में रिटायर्ड हुए। इसके पहले 2023 में उनके भ्रष्टाचार की सात शिकायतें ईओडब्ल्यू को भेजी गईं। वहीं, एजेंसी ने विभाग से जांच की अनुमति के लिए विभाग को लिखा, लेकिन उनको कोई जवाब नहीं मिला। हालांकि, जानकारों का कहना है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में कार्रवाई के लिए विभागीय अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। हद तो यह है कि इन शिकायतों के बावजूद मेहरा वेयरहाउस कॉरपोरेशन में संविदा पर सेवाएं देने के लिए योग्य मान लिया गया। वहीं, पूर्व जिला आबकारी अधिकारी भदौरिया 2020 में निलंबित हुए और अगस्त 2025 में रिटायर्ड हो गए। इतने लंबे समय बाद भी उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में सवाल उठ रहा हैं कि क्या सेवा काल में वरिष्ठ अधिाकरियों की तरफ से कार्रवाई में देरी राजनीतिक प्रभाव के कारण नहीं हुई?
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जरूरत के अनुसार गिरफ्तारी करते हैं
भोपाल लोकायुक्त एसपी दुर्गेश राठौर ने कहा कि हम जरूरत के अनुसार केस में गिरफ्तारी करते हैं। जहां तक जांच प्रभावित करने का सवाल है तो शासन के ही निर्देश है कि यदि किसी शासकीय सेवक पर कार्रवाई होती है तो उसे संबंधित स्थान से दूसरी जगह पदस्थ कर दिया जाता है।