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MP News: शराब कंपनियों और डिस्टिलरियों को बिना वैध दस्तावेज 358 करोड़ लौटाए, सीएजी ने उठाए गंभीर सवाल

Sat, 02 Aug 2025 09:43 PM IST
आनंद पवार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग में 358 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी सामने आई है। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार बिना दस्तावेज के शराब कंपनियों को भुगतान और फर्जी बैंक गारंटी जैसे गंभीर मामले उजागर हुए हैं।
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जहरीली शराब के कारण दर्जनों लोगों की मौत चिंताजनक (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ani
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विस्तार
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मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2019 से दिसंबर 2020 के बीच शराब निर्माता कंपनियों को बिना वैध दस्तावेजों के 358 करोड़ रुपये लौटाए गए। यह राशि एक्स-डिस्टिलरी प्राइस (EDP) के नाम पर दी गई थी, लेकिन भुगतान प्रक्रिया में अनिवार्य औपचारिकताएं पूरी नहीं की गईं। सीएजी ने इस पूरे मामले में सघन जांच की सिफारिश करते हुए, संबंधित लाइसेंसधारकों और बैंक अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा करने को कहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में प्रारंभिक स्तर पर ही जवाबदेही तय नहीं की गई, जिससे इतनी बड़ी राशि का गलत भुगतान संभव हो पाया।
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क्या है एक्स-डिस्टिलरी प्राइस (EDP)?
EDP वह रकम होती है जो सरकार शराब निर्माता कंपनियों को उनके उत्पाद गोदाम तक पहुंचाने के एवज में चुकाती है। शराब के ठेकेदार गोदामों से उत्पाद उठाते हैं और शुल्क अदा करते हैं। इसके बाद कंपनियां सरकार से EDP की वापसी की मांग करती हैं, जिसके लिए दावों के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है।
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सीएजी की जांच में क्या सामने आया?
रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनियों ने कोई औपचारिक दावा या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए थे, फिर भी उन्हें करोड़ों रुपये का भुगतान कर दिया गया। आबकारी आयुक्त कार्यालय के पास न तो दस्तावेज मौजूद थे और न ही इस राशि के भुगतान का कोई स्पष्ट आधार था। साथ ही, कोषालय स्तर पर भी भुगतान का मिलान नहीं किया गया।

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नर्मदापुरम में फर्जी बैंक गारंटी का मामला
सीएजी की रिपोर्ट में नर्मदापुरम जिले में 18.39 करोड़ रुपये की फर्जी बैंक गारंटी का मामला भी सामने आया है। 19 लाइसेंसधारकों के नाम से जारी की गई इन गारंटियों का सत्यापन नहीं किया गया। कुछ गारंटियां उन लोगों के नाम पर थीं जो ठेका लेने पहुंचे ही नहीं थे। बैंक गारंटी की वैधता जांचने में विभागीय लापरवाही सामने आई है।
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