एम्स भोपाल के शोध में यह पाया गया कि अस्पतालों में उपयोग किए जा रहे लेटेक्स दस्तानों में मौजूद प्राकृतिक रबर प्रोटीन और रासायनिक तत्व बार-बार संपर्क में आने से स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों में एलर्जिक प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर सकते हैं। इन प्रतिक्रियाओं में त्वचा पर चकत्ते, खुजली, जलन, सूजन, और सांस की समस्या जैसी शिकायतें शामिल हैं।
एम्स भोपाल ने एक बार फिर भारत का नाम वैश्विक स्वास्थ्य मंच पर रोशन किया है। संस्थान के औषधि विज्ञान विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. अहमद नजमी द्वारा किया गया अध्ययन मिस्र की राजधानी काहिरा में आयोजित फार्माकोविजिलेंस की 24वीं अंतरराष्ट्रीय सोसाइटी (आईएसओपी 2025) में प्रस्तुत किया गया। इस अध्ययन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में उपयोग किए जाने वाले व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को उजागर कर चिकित्सा जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस शोध में यह पाया गया कि अस्पतालों में उपयोग किए जा रहे लेटेक्स दस्तानों में मौजूद प्राकृतिक रबर प्रोटीन और रासायनिक तत्व बार-बार संपर्क में आने से स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों में एलर्जिक प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कर सकते हैं। इन प्रतिक्रियाओं में त्वचा पर चकत्ते, खुजली, जलन, सूजन, और सांस की समस्या जैसी शिकायतें शामिल हैं। अध्ययन में यह भी बताया गया कि लंबे समय तक लेटेक्स दस्तानों के प्रयोग से त्वचा संबंधी रोगों का खतरा बढ़ जाता है, जो स्वास्थ्यकर्मियों की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।
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नाइट्राइल दस्ताने बताए गए सुरक्षित विकल्प
डॉ. नजमी ने अध्ययन में यह अनुशंसा की कि स्वास्थ्य सेवाओं में लेटेक्स दस्तानों की जगह नाइट्राइल दस्ताने अपनाए जाएं। नाइट्राइल दस्ताने एलर्जी पैदा करने वाले प्रोटीन से मुक्त, अधिक टिकाऊ और संक्रमण नियंत्रण के लिए अधिक उपयुक्त हैं। शोध में यह भी सुझाया गया कि पीपीई से जुड़ी एलर्जिक प्रतिक्रियाओं की पहचान के लिए त्वचा पैच परीक्षण, आईजीई जाँच, प्रिक परीक्षण और सामग्री सुरक्षा मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाएँ नियमित रूप से की जाएँ।
स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा में बड़ा सुधार संभव
डॉ. नजमी ने बताया कि “नाइट्राइल दस्तानों को अपनाने से अस्पतालों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों की त्वचा एलर्जी और संक्रमणजनित समस्याओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इससे बीमारी के कारण कार्यदिवसों की हानि कम होगी, स्वास्थ्यकर्मी अधिक सुरक्षित और उत्पादक बनेंगे। शोध में यह भी कहा गया कि अस्पतालों की खरीद नीति में इस सरल बदलाव से देशभर में व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा और रोगी कल्याण को मजबूती मिल सकती है।
दूसरे शोध ने बनाया भारत का मेडिकल उपकरण सुरक्षा मानचित्र
इसी सम्मेलन में एम्स भोपाल की प्रोफेसर डॉ. शिल्पा काओरे ने भी एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किया, जिसका शीर्षक था मध्य भारत के मटेरियोविजिलेंस क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र से प्राप्त चिकित्सकीय उपकरणों से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं का स्वरूप। यह शोध भी काहिरा में आयोजित आईएसओपी 2025 सम्मेलन में पेश किया गया। अध्ययन वर्ष 2021 से 2024 के बीच मध्य भारत के विभिन्न अस्पतालों से प्राप्त रिपोर्टों के विश्लेषण पर आधारित था।
रिपोर्टिंग में आई बढ़ोतरी, बढ़ी जागरूकता
डॉ. काओरे के अध्ययन में पाया गया कि इन वर्षों में चिकित्सकीय उपकरणों से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है। यह इस बात का संकेत है कि स्वास्थ्यकर्मी अब उपकरण सुरक्षा को लेकर पहले से अधिक जागरूक हो चुके हैं। सबसे अधिक घटनाएँ श्रेणी बी और सी उपकरणों- जैसे सिरिंज, ऑर्थोपेडिक इम्प्लांट्स, इन्फ्यूजन पंप और पेशेंट मॉनिटर से संबंधित पाई गईं।