मध्य प्रदेश में मोहन सरकार के दो साल पूरे होने पर जहां सत्ता पक्ष उपलब्धियों का लेखा-जोखा पेश कर रहा है, वहीं विपक्ष सरकार को जमीनी हकीकत से रूबरू कराने में जुटा है। कांग्रेस विधायक और पूर्व कृषि मंत्री सचिन यादव ने किसानों की स्थिति को लेकर सरकार पर तीखा प्रहार किया है। पीसीसी कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए सचिन यादव ने कहा कि सरकार दो साल पूरे होने का जश्न मना रही है, लेकिन प्रदेश का किसान आज भी संकट में है। उन्होंने आरोप लगाया कि नीतिगत असफलताओं की वजह से खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है।
किसान मुद्दों से भटकी सरकार
सचिन यादव ने कहा कि सरकार ने किसानों के नाम पर सिर्फ प्रचार किया है। ग्रामीण इलाकों में बिजली की स्थिति बदहाल है और 10 घंटे निर्बाध आपूर्ति का वादा कागज़ों तक सिमट कर रह गया है। उन्होंने कहा कि अघोषित कटौती ने खेती को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने किसानों को 10 घंटे बिजली, सोयाबीन की MSP पर खरीदी और फसलों के बेहतर दाम देने का वादा किया था, लेकिन ये सभी वादे पूरे नहीं हुए। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
कमलनाथ सरकार की नीतियों का जिक्र
सचिन यादव ने पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय किसान केंद्र में था। जय किसान ऋण मुक्ति योजना के तहत फसल ऋण माफ किया गया, बिजली बिल में राहत दी गई और प्याज किसानों को समर्थन देने के लिए विशेष योजनाएं लागू की गईं। नकली खाद-बीज के खिलाफ अभियान और कृषि यंत्रों पर सब्सिडी भी किसानों के हित में अहम कदम थे। कांग्रेस विधायक ने कहा कि यदि सरकार सच में किसानों के प्रति गंभीर है तो उसे जमीनी समस्याओं का समाधान करना होगा, न कि सिर्फ उपलब्धियों का शोर मचाना।
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MSP और खरीदी पर सवाल
कांग्रेस विधायक ने आरोप लगाया कि 2025 में सोयाबीन की सरकारी खरीदी बंद कर दी गई और भावांतर जैसी योजनाओं के ज़रिये किसानों को नुकसान में धकेला गया। उन्होंने कहा कि गेहूं और धान की खरीदी को लेकर सरकार की गारंटी भी जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं देती।
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खाद और बीज को लेकर गंभीर आरोप
सचिन यादव ने कहा कि किसानों को समय पर खाद नहीं मिल रही और मांग करने पर उनके साथ दुर्व्यवहार तक हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश गुणवत्ताहीन खाद वितरण में देश के शीर्ष राज्यों में शामिल है, जो सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।