मध्य प्रदेश के जिला अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ठंड के मौसम में वायु प्रदूषण से होने वाली सांस की बीमारियों की रोकथाम के लिए सरकार पहली बार विशेष चेस्ट क्लीनिक शुरू कर रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग इन क्लीनिकों को आज 1 नवंबर से 28 फरवरी, 2027 तक चार महीने चलाएगा। इनमें डॉक्टर सांस के मरीजों की समय रहते पहचान, नि:शुल्क जांच और इलाज करेंगे।
पराली और कचरा जलाने, पटाखों, वाहनों के धुएं तथा सड़क की धूल से हवा की गुणवत्ता लगातार बिगड़ती है। प्रदेश के प्रमुख शहरों इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर 200 से 400 के बीच पहुंच जाता है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण पीएम 2.5 फेफड़ों तक पहुंचकर खांसी, सांस फूलने, सीने में जकड़न और अस्थमा जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देते हैं।
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मरीजों का बनेगा विशेष रिकॉर्ड
इन चेस्ट क्लीनिकों में डॉक्टर धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों, लकड़ी और उपले का धुआं सहने वाले लोगों, कचरा व पराली के संपर्क में आने वालों तथा अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों के निवासियों की विशेष जांच करेंगे। स्वास्थ्यकर्मी प्रत्येक मरीज की चिकित्सीय पृष्ठभूमि, आसपास के वातावरण और प्रदूषण में रहने की अवधि का पूरा ब्योरा दर्ज करेंगे। इससे भविष्य में फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के खतरे का सही आकलन संभव होगा।
डॉक्टर एवं उपकरण भी रहेंगे
प्रत्येक क्लीनिक में डॉक्टर, नर्स और परामर्शदाता सेवाएं देंगे। मरीजों के उपचार के लिए पल्स ऑक्सीमीटर, नेबुलाइजर, ईसीजी, एक्सरे और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर जैसे उपकरण उपलब्ध रहेंगे। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक डॉ. सलोनी सिडाना के निर्देश पर गांधी मेडिकल कॉलेज के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष और भोपाल के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी नोडल अधिकारी के रूप में व्यवस्थाएं संभालेंगे।
हर सोमवार केंद्र को जाएगी रिपोर्ट
जिला नोडल अधिकारी क्लीनिकों की गतिविधियों की निगरानी करेंगे। प्रत्येक सोमवार को अधिकारी मरीजों की जांच, दी गई दवाओं, इस्तेमाल उपकरणों और फॉलोअप की रिपोर्ट राज्य स्तर पर भेजेंगे। इसके पश्चात विभाग सभी जिलों की संयुक्त रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजेगा। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी तथा सिविल सर्जन नियमित रूप से इन क्लीनिकों की समीक्षा करेंगे।
अधिक जोखिम वाले मरीजों की अलग सूची
स्वास्थ्य विभाग अधिक जोखिम वाले मरीजों की अलग सूची तैयार कर उनकी नियमित निगरानी करेगा। आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर मरीजों को मेडिकल कॉलेज या विशेषज्ञ विभागों में रेफर करेंगे। चिकित्सक मरीजों को धूम्रपान छोड़ने, घरों में हवा की आवाजाही बेहतर रखने और वायु प्रदूषण के दौरान बाहरी गतिविधियां घटाने की सलाह दे रहे हैं।
ठंड में बढ़ता है प्रदूषण का असर
चिकित्सकों के मुताबिक, शीत ऋतु में ठंडी हवा धरातल के समीप बनी रहती है और गर्म हवा ऊपर रहती है, जिससे प्रदूषक कण नीचे ही फंसे रह जाते हैं। हवा की धीमी गति, बारिश की कमी, वाहनों के धुएं, सड़क निर्माण की धूल और पराली जलाने से प्रदूषण बढ़ता है।