विंध्य में 30 सीटें हैं।
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BJP के सामने यह हैं चुनौतियां
1. कद्दावर नेताओं की अनदेखी
विंध्य के कद्दावर नेताओं की अनदेखी हुई है। संतुलन नहीं बन पाने की वजह से इलाके में भाजपा उपचुनाव और मेयर चुनाव हार गई। विंध्य प्रदेश की मांग उठा रहे मैहर के भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी का टिकट कट गया है। नारायण त्रिपाठी बगावत करते हुए अलग पार्टी बनाने और सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर चुके हैं। भाजपा ने सीधी सीट से कद्दावर और सबसे मजबूत नेता केदारनाथ शुक्ला का टिकट काट दिया, जिसे लेकर वह भी बगावत की मशाल थाम रहे हैं।
2. कांग्रेस का बढ़ता फोकस
विंध्य इलाका भले ही अब भाजपा का गढ़ हो पर किसी जमाने में कांग्रेस का यहां दबदबा था। 2018 के बाद से ही यहां कांग्रेस ने फोकस बढ़ा दिया है। विंध्य इलाके को कांग्रेस ने चुनौती के तौर पर लिया और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह ने घर वापसी अभियान चलाकर पुराने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया। करीब एक साल पहले से अजय सिंह राहुल जमीनी स्तर पर रणनीति बनाने में जुटे हैं। पिछड़ा वर्ग को साधने के लिए पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल को सेंट्रल वर्किंग कमेटी सहित चुनाव संबंधी सभी महत्वपूर्ण समितियों में शामिल करके सियासी संदेश दिया। विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस ने दो जनआक्रोश यात्रा निकालकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने की हरसंभव कोशिश की है। अब राहुल गांधी की जनसभा के जरिए सियासी समीकरण साधने की कोशिश की है। सीधी के पेशाब कांड के बाद आदिवासियों और ब्राह्मणों की नाराजगी का फायदा उठाने की कोशिश हो रही है। राहुल की आदिवासी इलाके ब्यौहारी में सभा कराई गई, ताकि आदिवासियों को साधा जा सके।
3. सीधी पेशाब कांड
विंध्य इलाके के सीधी जिले का बहुचर्चित पेशाब कांड भी इस चुनाव में असर डाल सकता है। सूबे के शहडोल जिले में आदिवासी वोटर बड़ी संख्या में है। आदिवासी पर भाजपा नेता द्वारा पेशाब करने के मामले को लेकर कांग्रेस हमलावर रही है। हालांकि, भाजपा ने डैमेज कंट्रोल करने की भरसक कोशिश भी की है। मुख्यमंत्री शिवराज ने पीड़ित को सीएम हाउस बुलाकर पैर तक धोए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां सभा कर चुके हैं। आदिवासी बहुल इलाके में ये कितना कारगर रहा, ये वक्त ही बताएगा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि चुनाव में इसका असर पड़ेगा।
विंध्य को भाजपा का गढ़ माना जाता है।
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4. ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने की कोशिश
सीधी पेशाब कांड के डैमेज कंट्रोल में भाजपा ने खुद को आदिवासियों का हितैषी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शिवराज सरकार ने सीधी कांड के आरोपी के घर पर बुलडोजर चलवा दिया। माना जा रहा है कि इससे ब्राह्मण समाज नाराज हुआ। इलाके की 18 सीटें सामान्य कोटे से हैं, इसलिए भाजपा ब्राह्मणों की नाराजगी साधने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने चुनाव से तीन महीने पहले इलाके के राजेंद्र शुक्ल को मंत्री पद देकर ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश की। गिरीश गौतम को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया था। इस तरह इस क्षेत्र के ब्राह्मणों को खुश करने की कोशिश की जा रही है। दिक्कत ये है कि इस कसरत से राजपूत समाज नाराज़ हो गया तो विंध्य में ब्राह्मण बनाम राजपूत के वर्चस्व की लड़ाई भी देखने को मिल सकती है।
5. तीसरे फ्रंट की बढ़ती ताकत
विंध्य क्षेत्र से आम आदमी पार्टी (आप) ने नगरीय निकाय चुनाव में सिंगरौली के महापौर का चुनाव जीत कर एंट्री कर ली। अब पार्टी सिंगरौली, सतना और रीवा में आक्रामक तरीके से प्रचार कर रही है। अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान लगाातार इलाके पर नजर जमाए हुए हैं। 10 अक्टूबर को मान की सभा भी है। आम आदमी पार्टी भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी का फायदा उठाने की कोशिश में है। इसके अलावा यहां निर्दलीय प्रत्याशी भी खासा प्रभाव डालते हैं। 2008 के चुनावों में सूबे की तीन सीटें निर्दलीयों के खाते में गई थी, वहीं 2013 में दो सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी जीते थे। उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे इलाकों में बसपा भी सक्रिय है। 2008 में एक सीट जीतने के बाद बसपा भले ही जीत न पाई हो, त्रिकोणीय मुकाबलों की वजह जरूर रही है।