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सत्ता की सियासत: कांग्रेस में कई सीटों पर उलझे पेंच, नेताओं की मशक्कत के बाावजूद नहीं सुलझ रही गुत्थी

सार

MP Election 2023: मालवा-निमाड़ के रास्ते मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रही कांग्रेस की गुत्थी तमाम कोशिशों के बावजूद भी अभी तक सुलझ नहीं पाई है। कई सीटों पर पेंच बहुत उलझे हुए हैं। इन्हें सुलझाने में पार्टी के दिग्गजों को पसीना आ रहा है।
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कांग्रेस में कई सीटों पर उलझे पेंच - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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मध्यप्रदेश में कांग्रेस की 150 सीटों पर परिदृश्य स्पष्ट है और जनाक्रोश यात्रा की समाप्ति के बाद कभी भी सूची जारी हो सकती है। एक संभावना यह भी है कि पितृपक्ष खत्म होने के बाद ही सूची जारी हो। बताते चलें, मध्यप्रदेश के लिए बीजेपी ने अभी तक दो लिस्ट जारी कर दी है। इनमें पार्टी ने 79 उम्मीदवारों के नाम का एलान कर दिया है। इस बार पार्टी ने चुनाव में तीन केंद्रीय मंत्रियों समेत सात सांसदों को चुनावी मैदान में उतारा है।

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इसमें बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी शामिल है। पार्टी ने उन्हें इंदौर-1 से अपना प्रत्याशी बनाया है। इसके अलावा बीजेपी ने मध्यप्रदेश की नरसिंहपुर सीट से विधायक जालम सिंह पटेल का टिकट काटकर बड़े भाई केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। साथ ही केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को भी उम्मीदवार बनाया है।

कांग्रेस में इन सीटों पर उलझे हुए हैं पेंच - इंदौर-3
यहां पहले तो दो चचेरे भाई अश्विन जोशी और पिंटू जोशी के बीच जबरदस्त खींचतान चली। अश्विन यहां से तीन बार विधायक रहने के बाद दो चुनाव लगातार हार चुके हैं। पिंटू, महेश जोशी के बेटे हैं और अपने पिता के परम्परागत निर्वाचन क्षेत्र से 2018 में भी उन्होंने टिकट के लिए दावा किया था, लेकिन तब दिग्विजय सिंह के हस्तक्षेप के चलते समझौते की स्थिति बनी और अश्विन जोशी टिकट पा गए। इस बार पिंटू की दावेदारी ज्यादा मजबूत है और उन्हें मैदान में सक्रियता का फायदा मिल रहा है। उनके नाम पर कमलनाथ की भी सहमति है।
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इधर, अश्विन जोशी को इस बार अकेले किला लड़ाना पड़ रहा है। दिग्विजय सिंह ने हाथ खींच लिए हैं, इसलिए वे और कमजोर हुए हैं। शहर कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बन पाए अरविंद बागड़ी भी वैश्य मतों के समीकरणों के चलते यहां बेहद सक्रिय हैं और वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखने वाले कुछ बड़े घराने उनकी मदद भी कर रहे हैं। मंगलवार को स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक के दौरान जीतू पटवारी ने दमदारी से बागड़ी का नाम आगे बढ़ाया। यहां के पैनल में अब पिंटू जोशी के साथ अरविंद बागड़ी का नाम भी जुड़ गया है।



इंदौर-5 विधानसभा सीट
यहां कांग्रेस के टिकट का फैसला पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सत्यनारायण पटेल और प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष स्वप्निल कोठारी के बीच होना है। दोनों के अपने-अपने दावे हैं और कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। पटेल एक बार यहां से विधायक रह चुके हैं, तो एक बार हारे भी हैं। कोठारी यहां से पहली बार किस्मत आजमाना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान बेहद सक्रिय रहे पटेल दिग्विजय सिंह और प्रियंका गांधी के भरोसे उम्मीदवारी की आश लगाए बैठे हैं तो कोठारी की निगाहें कमलनाथ पर हैं।

दोनों दावेदार धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के माध्यम से अपनी जमीन मजबूत करने में लगे हैं। जो हालात इस विधानसभा क्षेत्र में बन गए हैं, उसके चलते यह स्पष्ट है कि किसी को भी मौका मिले, दूसरा विरोध करने में पीछे नहीं रहेगा। एक स्थिति यह भी बन सकती है कि यहां के टिकट का फैसला प्रियंका और राहुल गांधी की दखल से हो।

इंदौर-4 विधानसभा सीट
भाजपा का परम्परागत गढ़ माने जाने वाले इस विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट के लिए पार्टी के किसी दिग्गज नेता के बजाय दो नए चेहरों की दावेदारी सामने आई है। बडऩगर के बम परिवार से वास्ता रखने वाले इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ के संचालक अक्षय कांति बम और रियल इस्टेट कारोबारी राजा मांधवानी ने यहां से कांग्रेस के टिकट के लिए दावा किया है। दोनों पहली बार मैदान में आए हैं। बम को जहां दिग्विजय सिंह पर भरोसा है, तो मांधवानी भंवर जितेंद्र सिंह और कमलनाथ के भरोसे हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में 1984 में कांग्रेस ने सिंधी समाज पर भरोसा जताते हुए नंदलाल माटा को मौका दिया था और वे चुनाव जीत गए थे।

साल 1990 से कांग्रेस यहां से लगातार चुनाव हार रही है। इस दौर में पार्टी यहां से दो बार सिंधी उम्मीदवार को मौका दे चुकी है। मांधवानी यहां के सिंधी मतों के दम पर ही टिकट के लिए दावेदारी जता रहे हैं। वे वाल्मिकी और अल्पसंख्यक मतों को भी साधने में लगे हैं। बम का मजबूत पक्ष युवाओं के साथ ही वैश्य और ब्राह्मण समुदाय में मिल रहा समर्थन है।

महू विधानसभा सीट
इस सीट से कई नेता टिकट मांग रहे हैं, लेकिन बदले समीकरणों में सबसे मजबूत दावा हाल ही में भाजपा से कांग्रेस में आए रामकिशोर शुक्ला का माना जा रहा है। यहां से टिकट के एक मजबूत दावेदार अंतर सिंह दरबार की मुश्किल पार्टी की उस गाइड लाइन के कारण बढ़ गई हैं, जिसमें तीन बार लगातार चुनाव हार चुके नेताओं को उम्मीदवारी से बाहर रखने की बात कही जा रही है। महू की राजनीति में शुक्ला और दरबार एक-दूसरे के घोर विरोधी माने जाते हैं और यदि शुक्ला को मौका दिया जाता है तो फिर दरबार को साधने में बड़े नेताओं को ताकत लगाना होगी। यहां इन दोनों के बीच चल रही खींचतान का फायदा राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा के कट्टर समर्थक एडवोकेट अंशुमन श्रीवास्तव को मिल सकता है। एक और दावेदार जिनके नाम पर दरबार रजामंद हो सकते हैं, वे हैं शक्ति सिंह।

देवास विधानसभा सीट
इस सीट पर कांग्रेस 1990 से लगातार हार रही है। इस बार भी कोई खास संभावना नहीं है, लेकिन यहां से कांग्रेस के टिकट के लिए ऑटो मोबाइल कारोबारी प्रवेश अग्रवाल और पूर्व में विधानसभा चुनाव लड़ चुके रतनलाल चौधरी के बेटे प्रदीप चौधरी के बीच खींचतान चल रही है। प्रवेश कमलनाथ के चहेते तो हैं ही, उन्हें विवेक तन्खा और सज्जनसिंह वर्मा का भी समर्थन है। चौधरी दिग्विजय सिंह की पसंद हैं और इस विधानसभा क्षेत्र में खाती मतदाताओं का बाहुल्य उनका मजबूत पक्ष है।



धार विधानसभा सीट
भाजपा के कद्दावर नेता विक्रम वर्मा के प्रभाव वाली इस सीट पर कांग्रेस के टिकट के लिए सबसे मजबूत दावा तो कमलनाथ समर्थक कुलदीपसिंह बुंदेला का है, पर जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और दिग्विजय सिंह के कट्टर समर्थक बालमुकुन्द गौतम उनके नाम पर रजामंद नहीं हैं। बुंदेला और गौतम परिवार की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बहुत पुरानी है। गौतम यहां से एक बार फिर अपनी पत्नी प्रभा गौतम को मौका दिलवाना चाहते हैं, जो 2018 के चुनाव में नीना वर्मा से हार गई थी। यहां से एक मजबूत दावा जिला कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष रहे धीरज दीक्षित का भी है। दीक्षित भी कमलनाथ खेमे से ही ताल्लुक रखते हैं।

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