30 जनवरी साल 1948...देश के इतिहास में एक काले दिन के तौर पर दर्ज है। इसी दिन दिल्ली के बिड़ला हाउस परिसर में नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी (उम्र 78 साल) की हत्या कर दी थी। भारत की आजादी में बापू के योगदान को कौन ही भुला सकता है। वह उस वक्त दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। इसी वजह से भारत में उनकी पुण्यतिथि को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। हर साल 30 जनवरी को राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं के प्रमुख (सेना, वायु सेना और नौसेना) दिल्ली के राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
भोपाल में गांधी जी के दौरे की कहानी...
भोपाल के गांधी भवन न्यास के सचिव दयाराम नामदेव ने एक पुस्तक के हवाले से बताया कि सितंबर 1921 में डा. एमए अंसारी के प्रयासों से भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खान के आमंत्रण पर महात्मा गांधी तीन दिवसीय प्रवास पर भोपाल रियासत में आए थे। भोपाल प्रवास के समय गांधी जी पूरी तरह स्वस्थ नहीं थे। इस कारण भोपाल के बेनजीर मैदान में केवल एक सार्वजनिक सभा का आयोजन हो पाया था। मीरा बेन, सीएफ एण्ड्रज और महादेव देसाई महात्मा गांधी के साथ भोपाल आए थे। भोपाल नवाब से चर्चा में सहयोग के लिए जमनालाल बजाज एवं डॉ. जाकिर हुसैन को भोपाल बुला लिया गया था।
भोपाल के डॉ. अंसारी के अलावा डॉ. अब्दुल रहमान, मोहम्मद हयात तथा शोएब कुरैशी अन्य ऐसे व्यक्ति थे, जो गांधी जी के करीबी संपर्क में थे। भोपाल नवाब से भी इनके घनिष्ठ संबंध थे। शोएब कुरैशी मोहम्मद अली के दामाद थे और गांधी जी की जेल यात्रा के दौरान 'यंग इंडिया' का सम्पादन करते थे। उस वक्त देश के राजा-नवाबों में से भोपाल नवाब इस मायने में काफी अलग थे, क्योंकि उस वक्त केवल उनका आमंत्रण ही गांधी जी ने स्वीकार किया था। भोपाल में गांधी जी के ठहरने की व्यवस्था अहमदाबाद पैलेस स्थित राहत मंजिल में की गई थी।
भोपाल प्रवास के दूसरे दिन भोपाल शासन की ओर से गांधी जी की सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। सभा मंच के साथ ही सारे रास्तों को खादी से सजाया गया था। सभा में हजारों लोगों की भीड़ मौजूद थी। भोपाल में गांधी जी ने भाषण में कहा, देशी लोग भी यदि पूरी तरह प्रयत्नशील होते देश में रामराज्य की स्थापना की जा सकती है। रामराज्य का अर्थ हिन्दू राज्य नहीं है वरन यह ईश्वर का राज्य है। मेरे लिए राम और रहीम में कोई अन्तर नहीं है। मेरे लिए सत्य और सत्कार्य ही ईश्वर है। पता नहीं जिस रामराज्य की कहानी हमें सुनने को मिलती है, वह कभी इस पृथ्वी पर था या नहीं, किन्तु रामराज्य का आदर्श प्रजातंत्र के आदर्शों से मिलता जुलता है। कहा गया है कि दरिद्र से दरिद्र व्यक्ति भी कम खर्च में, अल्प अवधि में न्याय प्राप्त कर सकता था।