दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के विशेषज्ञों ने भारत में चीतों के आवासों पर बाड़ लगाने की सिफारिश की है। इसके बाद गुरुवार को चीता प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए गठित केंद्र की उच्च स्तरीय समिति के प्रमुख ने कहा कि भारत दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया की तरह चीतों के लिए चारदीवारी वाला आवास नहीं चाहता है, क्योंकि यह वन्यजीव संरक्षण के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।
बाड़ लगाना बिलकुल गलत : गोपाल
भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि बाड़ प्राकृतिक जानवरों की गतिविधियों को बाधित कर सकती है और आबादी के बीच अनुवांशिक आदान-प्रदान को बाधित कर सकती है। 11 सदस्यीय चीता संचालन समिति के अध्यक्ष राजेश गोपाल ने कहा कि आवासों में बाड़ लगाने के बारे में सोचना बिल्कुल गलत है। यह वन्यजीव संरक्षण के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। हमारी समझ यह है कि संरक्षित क्षेत्रों के क्षेत्रीय नेटवर्क को संरक्षित क्षेत्रों के राष्ट्रीय नेटवर्क में विलय कर देना चाहिए, ताकि वन्यजीव जीन प्रवाह के लिए सरंध्रता हो। उन्होंने कहा कि हमारे अपने सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दे हैं। हम पिछले 50 वर्षों से बाघों को संभाल रहे हैं और हम जानते हैं कि मानव-वन्यजीव इंटरफेस क्या है। हम चीतों को भी संभाल सकते हैं।
दक्षिण अफ्रीका के विशेषज्ञ मेरवे की राय जुदा
उधर, दक्षिण अफ्रीका के वन्य जीव विशेषज्ञ विन्सेंट वैन डेर मेरवे, जो इस परियोजना के साथ जुड़े हुए हैं, का कहना है कि इतिहास में कभी भी बिना बाड़ वाले रिजर्व में चीतों की पुन: बसाहट सफल नहीं हुई। अफ्रीका में इसे 15 बार आजमाया गया और हर बार असफल रहे। उन्होंने कहा कि हम ये बिलकुल भी नहीं कह रहे हैं कि भारत अपने सभी टाइगर रिजर्व में बाड़ लगाए। हम बस इतना कह रहे हैं कि बस दो या तीन को घेरे और सिंक रिजर्व को टॉप अप करने के लिए सोर्स रिजर्व बनाएं। सोर्स रिजर्व, वो आवास होते हैं, जो किसी विशेष प्रजाति के प्रजनन के लिए अनुकूल स्थिति प्रदान करते हैं। इन क्षेत्रों में प्रचुर संसाधन और अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियां हैं। वे आत्मनिर्भर आबादी का समर्थन कर सकते हैं। दूसरी ओर, सिंक रिजर्व ऐसे निवास स्थान होते हैं, जिनके पास सीमित संसाधन या पर्यावरणीय परिस्थितियां हैं, जो किसी प्रजाति के अस्तित्व या प्रजनन के लिए कम अनुकूल हैं।
अभयारण्यों में स्थानांतरित करने का सुझाव
कई विशेषज्ञों और सुप्रीम कोर्ट ने भी कूनो नेशनल पार्क में चीतों के लिए जगह की कमी पर चिंता व्यक्त की है। साथ ही चीतों को अन्य अभयारण्यों में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया है। वहीं, अधिकारियों ने कहा कि मध्य प्रदेश के गांधी सागर अभयारण्य को चीतों के वैकल्पिक आवास के रूप में तैयार किया जा रहा है। ये नवंबर तक तैयार हो जाएगा।
अध्ययन दौरे पर जाएगी टीम
इस मामले में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोमवार को कहा कि चीतों के संरक्षण और प्रबंधन में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों को परियोजना के तहत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के एक अध्ययन दौरे पर भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सुरक्षा, संरक्षण, संवर्धन और चीता सुरक्षा बल के लिए वित्तीय संसाधनों सहित सभी आवश्यक सहायता प्रदान करेगी।
इसी माह सात और चीते खुले में छोड़े जाएंगे
चीता संचालन समिति के अध्यक्ष गोपाल के अनुसार, जून के तीसरे सप्ताह तक दो मादा सहित सात और चीतों को जंगल में छोड़ दिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 17 सितंबर को नामीबिया से मध्य प्रदेश के कूनो में आठ चीते छोड़े थे। इसके बाद दूसरे स्थानांतरण में 12 चीतों को दक्षिण अफ्रीका से लाया गया और 18 फरवरी को कूनो में छोड़ा गया। मार्च और अप्रैल में तीन चीतों की मौत हो गई। बचे हुए 17 वयस्क चीतों में से सात को पहले ही जंगल में छोड़ दिया गया है। इसके बाद एक मादा चीता ने मार्च में चार शावकों को जन्म दिया। उनमें से तीन की मौत गर्मी और शरीर में पानी की कमी यानी निर्जलीकरण के कारण हुई।