इन दिनों सारा शहर पूरी रात जागा दिखाई दे रहा है। बाजारों में खरीद फरोख्त की रौनक, खानपान दुकानों पर जायकों की महक और गली मुहल्ले से लेकर चौक चौराहों तक भोपाली बतोलेबाजी की झलक। शाम को इफ्तार और उसके बाद नमाज ए तरावीह से फारिग होकर लोगों का रुख बाजार या पटियों की तरफ होता है। अल सुबह सेहरी तक चलने वाली इन बैठकों में बातों का अनंत सिलसिला चलता है। बीच बीच में मोबाइल पर चैट और बार बार कॉल का दौर भी चलता रहता है।
रौनकें यहां से वहां तक
आम दिनों में इकबाल मैदान देर रात तक लोगों की चर्चाओं से सजा दिखाई देता है। रमजान माह में यहां आने वालों की संख्या और बैठने की अवधि बढ़ जाती है। इधर चौक बाजार, इब्राहिमपुरा, नदीम रोड, लखेरापुरा जैसे बाजार सारी रात ग्राहकों से लबरेज दिखाई दे रहा है। साथ ही काजी कैंप, लक्ष्मी टॉकीज, इतवारा, बुधवारा, जहांगीराबाद जैसे इलाकों में खानपान के शौकीन पूरी रात अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।
भोपाल का इतिहास है पटिया संस्कृति
नवाबी तहजीब से पहचाने जाने वाले शहर भोपाल में सड़कों और गलियों के किनारे पत्थर और सीमेंट की बनी पटियों ने यहाँ के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में एक अहम भूमिका निभाई है। यहाँ एक जमाने में मजदूर वामपंथी नेता शाकिर अली खां और भारत के पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा जैसे सरीखे लोग भी पटिए पर अपनी आमद रखा करते थे।
ऐसे आई प्रचलन में
भोपाल में पटिया संस्कृति की शुरुआत की बात करते हुए साहित्यकार कहते हैं कि भोपाल में उस जमाने में कबाइली इलाकों में प्रचलित छोटे छोटे मकान होते थे। अमीरों के घर में तो मर्दानखाने और जनानखाने होते थे, लेकिन आम लोगों के घर में आज जिसे ड्राइंग रुम कहते हैं, का कोई इंतजाम नहीं था। फिर पर्दा प्रथा भी काफी सख़्त था, तो मर्दों ने अपनी बैठकों के लिए घर के बाहर पटिये डालने शुरु कर दिए।
नवाब काल से शुरुआत
भोपाल के जानकारों का कहना है कि रियासत के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह खां के जमाने में नवाब साहब जब अलीगढ़ से अपनी शिक्षा पूरी कर भोपाल वापस आए तो अपने दोस्त यारों को भी साथ लेते आए। उन्होंने उन्हें रियासत के आला ओहदों पर नौकरी दे दी।
इन लोगों ने बाहर से अपने रिश्तेदारों को बुलाकर यहां नौकरियों में भरना शुरु कर दिया। जाहिर है कि भोपाल निवासियों के लिए नौकरियां कम होती हैं तो उनके पास गप्पे मारने और महफिलें सजाने के अलावा चारा क्या था। इस स्थिति में पहाड़ी क्षेत्र में बसे गर्म मौसम वाले भोपाल में पत्थर की इन पटियों ने मेहमानखाने की शक्ल अख्तयार कर ली–एक तरह से ओपन एयर ड्रांइग रुम।
यह पटिए रहे मशहूर
इतिहास जानने वालों का कहना है कि कुछ पटिए तो विशेष व्यक्तियों या विचारधारा के नाम से भी जाने जाते थे। वामपंथी नेता शाकिर अली खां एक पटिये पर राजनीतिक चर्चा छेड़ते थे और नवाबी दौर में ही नज्जन दादा का पटिया नवाबी हुकुमत के खात्मे के लिए होने वाली चर्चाओं के लिए मशहूर था। जहांगीराबाद में एक होटल के सामने लगे पटिए पर साहित्यक लोग जमा होते थे। भारत की आजादी के बाद भोपाल में जोर शोर से चले विलय आंदोलन की रुपरेखाएं और रणनीतियाँ इन्हीं पटियों पर तैयार की गई थीं। वहीं भारत के पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसमें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और 1952 के आम चुनावों के बाद यहां के पहले मुख्यमंत्री बने।
नए दौर के पटिए यहां आबाद
पूर्व मंत्री मरहूम आरिफ अकील ने लक्ष्मी टॉकीज सराय को पटिया संस्कृति से जोड़कर बैठक का रूप दे दिया। यहां देर रात तक चलने लंबी चर्चाएं, नशिस्त और सियासी बैठकें अकील के रहने तक चलती रहीं। उनके बाद विधायक बेटे आतिफ अकील ने सिलसिला बरकरार तो रखा है लेकिन इन बैठकों में रौनक पहले से कम हो गई है। पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष और विधायक रहे सुरेन्द्र नाथ सिंह की न्यू मार्केट समता चौक की बैठक भी चर्चित और आकर्षक रही है।
बड़ी संख्या में लोगों की पहुंच वाली इस पटिया बैठक में कई बड़े फैसले, रणनीति और कार्यक्रम तय होते रहे हैं। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद के दो अलग दफ्तरों के अलावा उनके गल्ला मंडी स्थित निवास पर पटिया बैठक सजती है। हर रात की यह पटिया चर्चा कई छोटे बड़े नेताओं से सजती है। बीडीए उपाध्यक्ष रहे आगा अब्दुल कय्यूम खान ने भी वीआईपी रोड पर पटिया बैठक की शुरुआत की थी। कच्चे पटिया की बजाए फाइबर कुर्सियों वाली यह बैठक सर्दी के दिनों में सजती थी, जहां हाथ तापने के इंतजाम हुआ करते थे।
वक्त : सेहरी और इफ्तार
इफ्तार (6 मार्च) शाम 6.31 बजे
सेहरी (7 मार्च) सुबह 4.59 बजे