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Datia Bye-Election: दतिया में भाजपा की हार के पीछे असंतोष रहा सबसे बड़ा कारण,कांग्रेस को मिला जीत का रास्ता

Mon, 03 Aug 2026 04:46 PM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत सिर्फ सत्ता विरोधी वोटों का नतीजा नहीं रही। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक भाजपा में भीतरघात, टिकट परिवर्तन और स्थानीय समीकरणों ने परिणाम को प्रभावित किया, जबकि कांग्रेस को मजबूत स्थानीय उम्मीदवार और संगठन की एकजुटता का लाभ मिला।
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दतिया में भाजपा अपनी पराजय की समीक्षा करेगी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार के बाद अब हार-जीत के कारणों पर चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा के भीतर असंतोष, प्रत्याशी बदलने का फैसला और स्थानीय समीकरण इस चुनाव में अहम साबित हुए। वहीं कांग्रेस को संगठन की एकजुटता और उम्मीदवार की स्थानीय पहचान का फायदा मिला। इस उपचुनाव में शहर के कई मतदान केंद्रों पर मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में कम मतदान का असर भाजपा पर अधिक पड़ा, क्योंकि इन क्षेत्रों को पार्टी का मजबूत आधार माना जाता रहा है।  
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भाजपा में भीतरघात की सबसे ज्यादा चर्चा
चुनाव के दौरान भाजपा में भीतरघात की चर्चा लगातार होती रही। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस में भी पूर्व विधायक राजेंद्र भारती पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगे थे और मतदान से एक दिन पहले पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था। इसके बावजूद कांग्रेस संगठन पर इसका बड़ा असर नहीं दिखा। दूसरी ओर भाजपा में कार्यकर्ताओं की नाराजगी और अंदरूनी खींचतान की चर्चा चुनाव भर बनी रही। कई विश्लेषक इसे भाजपा की हार का एक बड़ा कारण मान रहे हैं।
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टिकट बदलने का फैसला पड़ा भारी
भाजपा ने इस बार पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। टिकट बदलने के बाद स्थानीय स्तर पर विरोध भी देखने को मिला। कई कार्यकर्ताओं ने नाराजगी जताई और कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफे भी दिए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस फैसले से संगठन में असंतोष बढ़ा और इसका असर चुनाव पर पड़ा।

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नए चेहरे को नहीं मिला पूरा समर्थन
आशुतोष तिवारी दतिया विधानसभा के लिए नया चेहरा थे। माना जा रहा है कि वे कम समय में क्षेत्र के सभी वर्गों के बीच अपनी मजबूत पहचान नहीं बना सके। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह पहले भी विधायक रह चुके हैं और क्षेत्र में उनकी पहचान पहले से थी। वह दतिया राजघराने से आते हैं। उनके पिता भी सांसद रह चुके हैं। 
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कांग्रेस को मिले ये बड़े फायदे
कांग्रेस को इस चुनाव में कई स्तर पर बढ़त मिली। घनश्याम सिंह की ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी पकड़ मानी जाती है। उनकी सरल, सहज और मिलनसार छवि। प्रदेश नेतृत्व ने भी चुनाव के दौरान एकजुट होकर प्रचार किया। साथ ही भाजपा में असंतोष और भीतरघात की चर्चाओं का राजनीतिक लाभ भी कांग्रेस को मिला। यदि आजाद भारत पार्टी के दामोदर यादव चुनाव में नहीं रहते तो कांग्रेस की बढ़त का आंकड़ा और बढ़ता।

कांग्रेस की जीत के बड़े फैक्टर
  • भाजपा में अंदरूनी असंतोष और कथित भितरघात की चर्चा
  • स्थानीय और परिचित चेहरे के रूप में घनश्याम सिंह की स्वीकार्यता
  • बूथ स्तर पर मजबूत माइक्रो मैनेजमेंट
  • जातीय और सामाजिक समीकरणों का पक्ष में जाना
  • युवाओं (Gen Z) तक बेहतर पहुंच बनाने की कोशिश
  • प्रदेश नेतृत्व का एकजुट होकर चुनाव प्रचार करना
  • प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी का बूथों तक पहुंचकर लगातार संपर्क अभियान चलाना
  • स्थानीय मुद्दों और सहानुभूति फैक्टर का लाभ
  • किसान आंदोलन और स्थानीय असंतोष का राजनीतिक फायदा

भाजपा की हार के बड़े फैक्टर
  • प्रत्याशी का स्थानीय स्तर पर अपेक्षाकृत नया चेहरा होना
  • सीमित जनसंपर्क और मजबूत स्थानीय पहचान का अभाव
  • डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट बदलने से कार्यकर्ताओं में असंतोष की चर्चा
  • संगठन के भीतर समन्वय की कमी और अंदरूनी खींचतान
  • ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में नाराजगी की चर्चा
  • कुशवाह समाज के एक हिस्से का अपेक्षित समर्थन नहीं मिलना
  • किसान आंदोलन और स्थानीय मुद्दों का असर
  • कुछ वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता या नाराजगी की चर्चा  


 

 

 
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