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Bhopal Iztima News: तकरीरों में तालीम, भाईचारा, सामाजिक समरसता की बातें, आलमी तबलीगी इज्तिमा में क्या हो रहा?

Sun, 01 Dec 2024 12:51 PM IST
उदित दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
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भोपाल आलमी तबलीगी इज्तिमा - फोटो : अमर उजाला
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77वें आलमी तबलीगी इज्तिमा के तीसरे दिन भी सुबह से उलेमाओं की तकरीर और बयान का सिलसिला जारी है। सुबह से रात तक चलने वाली इन तकरीरों में तालीम, भाईचारा, सामाजिक समरसता और अल्लाह की इबादत एवं फरमा बरदारी की ताकीद की जा रही है। रविवार सुबह तक इस मजमे में करीब 7 लाख से ज्यादा लोग मौजूद हैं, जिनमें देशभर की जमातों के अलावा करीब 24 विदेशी देशों के मेहमान भी शामिल हैं। उम्मीद की जा रही है कि रविवार की छुट्टी और सोमवार सुबह होने वाली दुआ ए खास के चलते इस मजमे में और इजाफा होगा। दुआ ए खास में करीब 12 लाख लोगों की शिरकत की उम्मीद की जा रही है।

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उलेमाओं ने कहा- दीन को समझें, सबके लिए समभाव रखें
आलमी तब्लीगी इज्तिमा में दुनियाभर से आए मुसलमानों के बीच उलेमा इस्लामी शिक्षा, भाईचारे और सुधार का संदेश अपनी तकरीरों में दे रहे हैं। इस दौरान मौलाना जमशेद साहब ने इस्लामी जीवन के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डाली। उन्होंने ईमान की ताकत, इस्लामी अदब और दीन के प्रचार-प्रसार की अहमियत पर जोर दिया। मौलाना ने कहा कि दीन का काम केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह एक इबादत है, जो इंसान को अल्लाह के करीब ले जाती है। इसी तरह मौलाना सईद साहब के बयान का केंद्र इस्लामी अखलाक और समाजी सुधार था। उन्होंने बताया कि इस्लाम सिर्फ इबादत का मज़हब नहीं, बल्कि यह इंसानी जिंदगी के हर पहलू को संभालने वाला मज़हब है। मौलाना ने मुसलमानों से अपील की कि वे अपने किरदार से इस्लाम का सच्चा संदेश दूसरों तक पहुंचाएं। अपनी तकरीर के दौरान मौलाना मंज़ूर साहब  तौहीद और इख़लास पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को हर समय अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और अपने सभी कामों में उसकी रज़ा को प्राथमिकता देनी चाहिए। हर शाम मगरिब की नमाज के बाद होने वाली खास महफिल को दिल्ली मरकज से आए मौलाना सआद साहब कांधलवी संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने अपने उद्बोधन में सामाजिक समरसता पर जोर दिया। उनका बयान इस्लामी एकता और उम्मत के सुधार पर आधारित है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में मुसलमानों को अपनी खामियों को दूर कर आपसी इत्तेहाद को मजबूत करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि दीन के काम को बढ़ावा देने के लिए हर मुसलमान को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी।

भोपाल आलमी तबलीगी इज्तिमा - फोटो : अमर उजाला
खिदमत से मिलता है खुदा...
आलमी तब्लीगी इज्तिमा  आयोजन के दौरान शहर के कई ऐसे बाशिंदें नजर आए, जो पूरे चार दिन लोगों के आने से लेकर लौटते तक की उनकी सभी व्यवस्थाएं करने में जुटे रहें। यह पहला मौका नहीं है, वे कई सालों से हर साल इज्तिमा आने जाने वाले लोगों की खिदमत करते हैं। उनका मुख्य काम भोपाल आए लोगों को इज्तिमागाह तक छोड़ना और खाने-पीने का इंतजाम करना होता है। इसी तरह खिदमत में शामिल 93 साल के मोहम्मद शम्मू भी हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने इज्तिमा की शुरुआत से ही यहां आने जाने वाले लोगों की ख़िदमत की है, उस समय जब इज्तिमा शुरू हुआ था, तब वे हम्माली का काम किया करते थे। तबसे आज तक हर इज्तिमा में लोगों की खिदमत के इरादे से आते हैं। वे कहते हैं कि हालांकि, अब मेरे बस की नहीं बची है, फिर भी आता ही हूं। पुराने वक्त में हम तांगों से लोगों को यहां से ताजुल मसाजिद पहुंचाते थे। उस टाइम भी ट्रेनों से लोग 24 घंटे आया करते थे। मुझे याद है उस टाइम ताज उल मसाजिद में चिम्नियां जला करती थीं। इसी तरह भोपाल के रहने वाले मोहम्मद अख्तर (77) ने बताया कि वह इज्तिमा में करीब 50 वर्षों से ख़िदमत कर रहे हैं। पहले और अब के दौर में बहुत फर्क है। लोग उस समय ट्रेनों से आना अधिक पसंद करते थे। भोपाल स्टेशन पर भारी भीड़ उतरती थी, हमारी कोशिश रहती थी कि लोगों की खिदमत या उनको मिलने वाली सुविधाओं को बेहतरी से पूरा करें। लोगों के आते थे हम अपने-अपने तांगे लेकर उन्हें ताजुल मसाजिद छोड़ दिया करते थे। उस टाइम ताजुल मसाजिद में भी बहुत अधिक इंतजाम नहीं हुआ करते थे, कई बार बारिश हो जाती थी तो कीचड़ मच जाती थी तो लोगों को आसपास की मस्जिदों में ठहराया करते थे। इसके अलावा वहां बहुत सारे महिलाएं आतीं थी जो बाहर खाना बनाने का काम किया करती थीं।

खर्च कर दी जिंदगी 
तबलीग से सिखाई जाने वाली भलाई की बातें और खुद की जिंदगी में एक बेहतर अनुशासन कायम रखने की नीयत से लोगों का जमातों में निकलने का सिलसिला करीब सौ बरस पुराना हो चुका है। भोपाल इज्तिमा में पहुंचे लोगों में कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा जमातों में गुजार दिया है। साथ ही कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने दीन की इस महफिल को पहली बार अनुभव किया है।

दीन की खिदमत बड़ा काम 
मूलतः मथुरा के रहने वाले शमसुद्दीन कारोबारी सिलसिले को पार करते हुए ग्वालियर होते हुए भोपाल पहुंच गए हैं। पुराने शहर के बाशिंदे शमसुद्दीन बताते हैं दुनिया में सब कुछ जरूरी है, लेकिन उससे बड़ा काम दीन की खिदमत है। वे बताते हैं कि करीब 55 बरस से वे लगातार जमातों और इज्तिमा का हिस्सा बन रहे हैं। घर के सुकून से ज्यादा जमातों में रहने वाले 90 वर्षीय शमसुद्दीन महीने में तीन दिन, साल में चालीस दिन जमात में आवश्यक रूप से जाते हैं। इसके अलावा वे कई बार चार महीने के चिल्ले पर भी कई बार जा चुके हैं। 
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भोपाल आलमी तबलीगी इज्तिमा - फोटो : अमर उजाला
कामयाबी का रास्ता इसी से होकर गुजरता है
मेडिकल डिपार्टमेंट में अकाउंटेंट रहे हाजी अनवर उल्लाह खान भी अपने रिटायरमेंट के बाद ज्यादा वक्त जमातों और तबलीगी काम में गुजारते हैं। करीब 30 वर्षों से लगातार आलमी तबलीगी इज्तिमा में शिरकत कर रहे 82 वर्षीय अनवर उल्लाह बताते हैं कि असल सुकून दीन की बात में है और कामयाबी का रास्ता भी इसी से होकर गुजरता है। उम्र 40 के पार ही पहुंची है, लेकिन काजी सैयद अनस अली नदवी ने जमातों का रास्ता छोटी उम्र से ही इख्तियार कर लिया था। चार महीने, चालीस दिन और तीन दिन की इज्तिमा हाजिरी उनकी अल्पायु से ही शुरू हो गई थी। काजी अनस बताते हैं कि इंसान के दुनिया में आने का असल मकसद मौत के बाद की जिंदगी को संवारना है। जमातों के रास्ते इसी के लिए मेहनत की जा रही है।
8 वर्षीय मेहरान पहली बार इज्तिमा में शामिल होने पहुंचे हैं। कुरआन की तालीम से फारिग होने के बाद वे नमाजों की पाबंदी करते रहे हैं। तफरीह के बतौर कई बार अपने वालिद शकील खान के साथ इज्तिमागाह भी पहुंचे। लेकिन ये पहला मौका है, जब वे पूरे तीन दिन की जमात के साथ इज्तिमा में पहुंचे हैं। स्कूल से छुट्टी और अपनी दैनिक दिनचर्या को नजरंदाज कर मेहरान ने जमात में शरीक होने का मकसद बेहतर तरबियत और कुछ अच्छे सबक सीखना बताया।

कल दुआ के साथ समापन
चार दिन के इज्तिमा का समापन सोमवार सुबह दुआ ए खास के साथ होगा। दुआ के लिए सुबह 9 बजे का वक्त मुकर्रर किया गया है। सुबह फजिर की नमाज के बाद मौलाना सआद साहब का खास बयान होगा। इस दौरान वे जमातों में निकलने वाले लोगों को इस सफर में अपनाए जाने वाले अखलाक, रखे जाने वाले ख्याल और किए जाने वाले काम समझाएंगे। इसके बाद सुबह करीब 9 बजे दुआ होगी। जिसके बाद लोग इज्तिमागाह से रुखसत होना शुरू हो जाएंगे। इज्तिमा प्रबंधन ने बताया कि दुआ के बाद इज्तिमा से करीब 2 हजार जमातें  देशभर के लिए निकलेंगी।

खास खास
  • इज्तिमा आयोजन के चलते पुराने शहर के विभिन्न क्षेत्रों में सन्नाटे पसरे दिखाई दे रहे हैं। यहां बाजार बंद और लोगों की आवाजाही कम नजर आ रही है।
  • इज्तिमा में शामिल विदेशी जमातों के साथ द्विभाषी भी मौजूद हैं, जो उन्हें उलेमाओं के बयान का सार समझा रहे हैं। इसी तरह मूक बधीर जमातियों को भी सांकेतिक भाषा में बयान समझाए जा रहे हैं।
  • भोपाल टॉकीज से इज्तिमागाह तक यातायात व्यवस्था सम्हाल रहे वालेंटियर्स ने अपनी शिफ्टों का बंटवारा कर रखा है। लेकिन ड्यूटी के बाद भी वे अपने क्षेत्रों में ही मौजूद रहते हैं।
  • सियासी गतिविधियों से दूर इस आयोजन में जन प्रतिनिधियों का अप्रत्यक्ष जोड़ ही है। उन्हें भी इस आयोजन में आमजन की तरह ही शामिल होना पड़ रहा है।
  • इज्तिमा समापन के बाद सोमवार को विभिन्न पार्किंग से वाहनों को बारी बारी से निकाला जाएगा। पैदल, दोपहिया, छोटे वाहन और बाद में भारी वाहनों के निकलने की व्यवस्था है, ताकि शहर के यातायात पर प्रभाव न पड़े।
  • ताजुल मसाजिद में होने वाले आयोजन के दौर से इसी परिसर में एक बड़ा व्यापारिक मेला भी लगता आया है। गर्म कपड़ों के लिए मशहूर यह बाजार रस्ते का माल सस्ते में की तर्ज पर आकार लेता है। इसकी शुरुआत सोमवार शाम से होगी, जो करीब दो माह तक चलेगा।
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