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Bhopal: निजी कॉलेजों में NRI कोटा में गड़बड़ी का आरोप, NSUI ने PS से की शिकायत, बोले-1 हजार करोड़ की अवैध कमाई

Mon, 08 Sep 2025 07:01 PM IST
संदीप तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

प्रदेश के निजी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया में बड़ी गड़बडी का आरोप एनएसयूआई ने लगाया है। उनका आरोप है कि एमबीबीएस, बीडीएस और पीजी (एमडी,एमएस,एमडीएस) कोर्सों में एनआरआई कोटे के नाम पर हर साल 800 से 1000 करोड़ रुपए की अवैध कमाई की जा रही है।
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पीसीसी में प्रेसवार्ता - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मध्यप्रदेश के निजी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया में बड़ी गड़बडी का आरोप भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) ने लगाया है। संगठन का कहना है कि एनआरआई कोटा में बड़ी गड़बड़ी की जा रही है। सोमवार को पीसीसी में आयोजित प्रेस वार्ता में कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी, एनएसयूआई के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने कहा कि  निजी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में एमबीबीएस बीडीएस तथा पीजी (एमडी,एमएस,एमडीएस) कोर्सों में एनआरआई कोटे से हो रहे प्रवेश में भ्रष्टाचार और धांधली की जा रही है। उन्होंने इसकी शिकायत विभाग के प्रमुख सचिव से भी की है।
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हर साल 800 से 1000 करोड़ की अवैध कमाई
कांग्रेस प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने कहा कि एमबीबीएस, बीडीएस और पीजी (एमडी/एमएस/एमडीएस) कोर्सों में एनआरआई कोटे के नाम पर हर साल 800 से 1000 करोड़ रुपए की अवैध कमाई की जा रही है। आरोप है कि यह पूरा खेल शासन, शिक्षा विभाग और निजी कॉलेज संचालकों की मिलीभगत से चलता है, जिससे गरीब और मेधावी छात्रों का भविष्य लगातार दांव पर लग रहा है।

जानबूझकर गड़बड़ी
एनएसयूआई प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने कहा कि कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया में जानबूझकर गड़बड़ी की जाती है। निजी कॉलेज मोटी रकम लेकर छात्रों को फर्जी एनआरआई सर्टिफिकेट उपलब्ध कराते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में दिए आदेश में स्पष्ट किया था कि केवल माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची या दादा-दादी ही स्पॉन्सर हो सकते हैं। लेकिन मप्र में कोई भी व्यक्ति पैसे देकर स्पॉन्सर बन जाता है। नियम के मुताबिक फीस भी स्पॉन्सर के खाते से जमा होनी चाहिए, लेकिन यहां छात्र या उसका परिवार ही फीस भरता है।
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फर्जी निवासी प्रमाण पत्र बनवाकर प्रवेश
परमार ने आरोप लगाया कि कई बार बाहर के राज्यों से पढ़े छात्रों को फर्जी निवासी प्रमाण पत्र बनवाकर प्रवेश दिया जाता है, जबकि प्राथमिकता मध्यप्रदेश के मूल निवासी छात्रों को मिलनी चाहिए। इससे प्रदेश के SC, ST, OBC और EWS वर्ग के मेधावी छात्र-छात्राओं को नुकसान उठाना पड़ता है। एनएसयूआई ने कहा कि पीजी कोर्स में एनआरआई सीटें केवल क्लिनिकल ब्रांच (जैसे गायनी, मेडिसिन, रेडियोलॉजी, डर्मेटोलॉजी आदि) में रखी जाती हैं, क्योंकि इनकी सबसे ज्यादा मांग है। इन सीटों की कीमत एमबीबीएस में डेढ़ से दो करोड़ और पीजी में तीन करोड़ रुपए तक वसूली जाती है। नॉन-क्लिनिकल ब्रांच में एनआरआई सीटें जानबूझकर नहीं रखी जातीं।

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सुप्रीम कोर्ट आदेश की अनदेखी
परमार ने कहा कि मप्र शासन ने सुप्रीम कोर्ट और राजपत्र (9 मार्च 2018) में दिए स्पष्ट निर्देशों का उल्लंघन किया है। दस्तावेजों का सत्यापन एंबेसी से कराने की बात कहकर गुमराह किया जा रहा है, जबकि यह काम शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय के प्रतिनिधियों से होना चाहिए और दस्तावेजों को पोर्टल पर सार्वजनिक करना जरूरी है।

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एनएसयूआई की प्रमुख मांगें

- STF जांच हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की निगरानी में हो।
- प्रवेशित छात्रों के दस्तावेज शासकीय प्रतिनिधियों से सत्यापित कर सार्वजनिक करें।
- दोषी अधिकारियों और कॉलेज संचालकों पर एफआईआर दर्ज हो।
- भविष्य में धांधली रोकने के लिए कड़े व पारदर्शी नियम लागू किए जाएं।
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