मध्यप्रदेश का व्यापमं घोटाला एक ऐसी अंतहीन कहानी बनकर रह गया है जहां एक एक कर लोग मौत की नींद सो रहे हैं और जांच करने वाली एजेंसियां अभी खाली हाथ हैं।
लेकिन इस घोटाले की भेंट चढ़ चुके लोगों की ऐसी ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं कि सुनने वाले अपने आंसु नहीं रोक पाएं। ऐसी ही कहानी है घोटाले में आरोपी बनाने के बाद आत्महत्या करने वाले डाक्टर की। जिसकी मौत के अगले दिन ही एसटीएफ ने उसे क्लीन चिट दे दी।
अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश के एतिहासिक शहर ग्वालियर में एक खस्ताहाल घर में बैठे 62 साल के नारायण सिंह भदौरिया उस दिन से भगवान के बुलावे का इंतजार कर रहे हैं जब उनके जवान बेटे ने जान देकर आत्महत्या कर ली। वो कहते हैं कि अगर उन्हें कल भी मौत आ जाए तो कोई दुख नहीं होगा।
बकौल भदौरिया उनके जीवन में अब किसी बात का महत्व नहीं रह गया है, जीवन उसी दिन से उद्देश्यविहीन हो गया जब बीती सात जनवरी को उनकेजवान बेटे ने खुद को फांसी पर लटका लिया।
बेटे की मौत के बाद सदमे से पत्नी भी चल बसी
बेटे की मौत के कुछ दिन बाद उनकी पत्नी की भी सदमे से मौत हो गई। भदौरिया की कहानी मध्यप्रदेश के सबसे बड़े घोटाले की जांच कर रही पुलिस की क्रूर और भयावह लापरवाही का एक उदाहरण है। बेबस और दुखद पिता जांच अधिकारियों को बस असंवेदनशील के अलावा कुछ भी नहीं कह सकता।
भदौरिया के बेटे रामेन्द्र सिंह ने उस समय मात्र 28 सल की उम्र में खुदकुशी कर ली थी जब उसे शहर के गजरारजा मेडिकल कालेज के अधिकारियों ने उसे पीएमटी परीक्षा में पेपर साल्व करने का आरोपी बनाया था।
लेकिन उसकी मौत के अगले दिन मामले की जांच कर रही एसटीएफ ने साफ कर दिया कि वो मामले की जांच से उसका नाम पहले ही निकाल चुकी है। आंखों में आंसु लिए भदौरिया कहते हैं कि मैं नहीं जानता भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया।
वहीं पुलिस के अनुसार रामेन्द्र जो ग्वालियर के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में चिकित्सक था उसने प्यार में नाकामी के कारण खुदकुशी की राह चुनी। हालांकि भदौरिया भी इस बात से पूरी तरह इंकार नहीं करते हैं लेकिन वो कहते हैं कि उनका बेटा तभी से जबरदस्त मानसिक तनाव में चल रहा था जब से उसके नाम इस घोटाले में एफआईआर दर्ज हुई थी।
पुलिस के अनुसार नाकाम प्रेम में डॉक्टर ने जान दी
भदौरिया कहते हैं कि मेरा बेटा उसी दिन मर गया था जब उसके नाम मामले में फर्जी मुकदमा दर्ज हुआ था। वो बताते हैं कि उनका बेटा एक होनहार छात्र था जो पीएमटी परीक्षा की तैयारी कर रहे बच्चों को फ्री कोचिंग देने के लिए तैयार रहता था।
वो बताते हैं कि जब वो एक डॉक्टर बन गया तो मैं सातवें आसमान पर था, लेकिन आज मेरा काम उस भोजन पर ही चल रहा है जो मेरे भतीजे के यहां से मेरे लिए आ जाता है।
पडोसी भदौरिया के जीर्णशीर्ण घर की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि एक मिल वर्कर भदौरिया की इतनी हैसियत नहीं थी कि वो बेटे का मेडिकल में एडमिशन कराने के लिए दलालों को लाखों रुपए दे पाते।
घोटाले में नाम आने पर डॉक्टर को छोड़ गई थी प्रेमिका
भदौरिया बताते हैं कि उनके अपने बेटे से उस समय मतभेद हो गए थे जब वह एक महिला से प्रेम प्रसंग करने लगा था जो उसके साथ ही एक डॉक्टर थी। लेकिन दूसरी जाति की होने के बावजूद भी उन्होंने उसकी शादी पर सहमति दे दी थी।
लेकिन वो (पुलिसवाले) कहते हैं कि उसने नाकाम इश्क के चलते आत्महत्या की है लेकिन हकीकत में मेरा बेटा तब से एक बुरे मानसिक दबाव से गुजर रहा था जब से उसका नाम इस घोटाले में घसीटा गया था।
घटना के पीछे का एक तथ्य ये भी है कि जिस महिला से वह प्रेम करता था उसने घोटाले में उसका नाम आने के बाद उससे संबंध खत्म कर लिए थे। इसी के बाद से वह तनाव में रहने लगा था।