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सप्रे संग्रहालय के स्थापना दिवस पर विमर्श: आंचलिक पत्रकारिता ही भारत की प्रतिनिधि पत्रकारिता

Thu, 20 Jun 2019 01:58 PM IST
राजेश बादल राजेश बादल
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सप्रे संग्रहालय के स्थापना दिवस पर जुटे बुद्धिजीवी पत्रकार व लेखक - फोटो : Facebook @Rajesh Badal
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भोपाल के राष्ट्रीय सप्रे संग्रहालय ने बुधवार को अपना 36वां स्थापना दिवस मनाया। इसके 35 साल के सफर की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि आज़ादी के बाद यह संस्थान पत्रकारिता का एक आधुनिक तीर्थ बनकर उभरा है। जहां एक हजार से अधिक शोधार्थियों ने अपनी पत्रकारिता के रिसर्च का मूल आधार इस संस्थान को बनाया हो, उसे आप तीर्थ नहीं तो और क्या कहेंगे।

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लाखों दस्तावेज, जिसके अभिलेखागार में सुरक्षित हों और हर दस्तावेज अपने भीतर भारत के आधुनिक काल की अनेक समाचार कथाएं समेटे हो उससे बड़ा अनमोल खजाना आपको कहां मिलेगा? किसी भी घटना का नाम लीजिए- सप्रे संग्रहालय उसकी  प्रामाणिक जानकारी आपके लिए पेश कर देगा।

इस आयोजन में स्वर्गीय माधव राव सप्रे के पौत्र अशोक सप्रे जी की उपस्थिति वहां मौजूद सैकड़ों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लिए दिमागी शीतलता प्रदान करने वाली थी।इस नायाब संस्था की नींव डालने वाले वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने अपने संबोधन में दास्तान ए संस्थान सुनाई तो सभी लोग भाव विह्वल हो गए। 
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मध्यप्रदेश सरकार की राजेंद्र माथुर फेलोशिप योजना के तहत वरिष्ठ पत्रकार हरीश पाठक ने इस संग्रहालय की सहायता से एक ऐसे अद्भुत ग्रंथ को आकार दिया, जो आजादी के बाद की पत्रकारिता का सबसे बड़ा और प्रामाणिक संदर्भ माना जा सकता है। इसमें उन्हें कई साल लगे।



हरीश पाठक ने देश भर में घूम घूम कर आधी सदी की प्रतिनिधि आंचलिक समाचार कथाओं का संकलन  किया। इन खबरों ने अपने जमाने में हिन्दुस्तान की पत्रकारिता की मुख्य धारा को अपनी खुशबू से अरसे तक महकाए रखा है। 
 

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आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता पर गंभीर चर्चा

सप्रे संग्रहालय के इस आयोजन का मुख्य आकर्षण हरीश पाठक के इस ग्रंथ- आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता पर एक गंभीर चर्चा भी थी। इसमें वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा, उमेश त्रिवेदी, हरीश पाठक और राजेश बादल ने हिस्सा लिया।

राजेंद्र शर्मा ने आज की पत्रकारिता में विकृत हिंदी की घुसपैठ पर अपनी चिंताओं को रखा। उन्होंने महान संपादक राजेंद्र माथुर के इस कथन का समर्थन किया कि लोकतंत्र में पत्रकारिता का एक धर्म विपक्ष की भूमिका निभाना भी है। उमेश त्रिवेदी ने आज के दौर में गुम  हो रही सरोकारों की पत्रकारिता से हो रहे नुकसान से आगाह किया। 

राजेश बादल का कहना था कि दरअसल भारत में अन्य कोई पत्रकारिता नहीं है। आंचलिक पत्रकारिता ही भारत की पहचान-पत्रकारिता है। जोर इस बात पर भी था कि इस ग्रंथ में जिन कथाओं को लिया गया है, उन्हें पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में भी शामिल होना चाहिए। उन पर फिल्में भी बनाने की जरुरत है। इससे नई नस्ल अतीत के इन संघर्षों से वाकिफ हो सकेगी। 

हरीश पाठक ने इन कहानियों को याद करते हुए उन्हें आज भी प्रासंगिक बताया। इस चर्चा के दौरान कमोबेश सभी ने दिवंगत राजेंद्र माथुर के चिंतन और लेखन का हवाला दिया। डॉ. राकेश पाठक ने इस परिसंवाद का संचालन किया।

इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार श्यामलाल यादव को माधवराव सप्रे सम्मान और नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक और पूर्व में क्रांतिकारी पत्रकार रहे पंकज चतुर्वेदी को महेश सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें यह सम्मान देने के लिए राज्य के जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा पहुंचे थे। मध्यप्रदेश में विचार पत्रकारिता को लंबे समय तक पोसने वाले राजेंद्र हरदेनिया ने आभार प्रदर्शन किया।
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