सप्रे संग्रहालय के इस आयोजन का मुख्य आकर्षण हरीश पाठक के इस ग्रंथ- आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता पर एक गंभीर चर्चा भी थी। इसमें वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा, उमेश त्रिवेदी, हरीश पाठक और राजेश बादल ने हिस्सा लिया।
राजेंद्र शर्मा ने आज की पत्रकारिता में विकृत हिंदी की घुसपैठ पर अपनी चिंताओं को रखा। उन्होंने महान संपादक राजेंद्र माथुर के इस कथन का समर्थन किया कि लोकतंत्र में पत्रकारिता का एक धर्म विपक्ष की भूमिका निभाना भी है। उमेश त्रिवेदी ने आज के दौर में गुम हो रही सरोकारों की पत्रकारिता से हो रहे नुकसान से आगाह किया।
राजेश बादल का कहना था कि दरअसल भारत में अन्य कोई पत्रकारिता नहीं है। आंचलिक पत्रकारिता ही भारत की पहचान-पत्रकारिता है। जोर इस बात पर भी था कि इस ग्रंथ में जिन कथाओं को लिया गया है, उन्हें पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में भी शामिल होना चाहिए। उन पर फिल्में भी बनाने की जरुरत है। इससे नई नस्ल अतीत के इन संघर्षों से वाकिफ हो सकेगी।
हरीश पाठक ने इन कहानियों को याद करते हुए उन्हें आज भी प्रासंगिक बताया। इस चर्चा के दौरान कमोबेश सभी ने दिवंगत राजेंद्र माथुर के चिंतन और लेखन का हवाला दिया। डॉ. राकेश पाठक ने इस परिसंवाद का संचालन किया।
इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार श्यामलाल यादव को माधवराव सप्रे सम्मान और नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक और पूर्व में क्रांतिकारी पत्रकार रहे पंकज चतुर्वेदी को महेश सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें यह सम्मान देने के लिए राज्य के जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा पहुंचे थे। मध्यप्रदेश में विचार पत्रकारिता को लंबे समय तक पोसने वाले राजेंद्र हरदेनिया ने आभार प्रदर्शन किया।