राजधानी में हजारों युवा और किशोर नशे के कारोबारियों के निशाने पर हैं। निजी विश्वविद्यालयों व कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के बीच और खासकर हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों को लाखों रुपये के चरस और गांजे की सप्लाई रोज की जाती है।
बुधवार को एसटीएफ ने एक गिरोह के तीन आरोपियों को 6 किलो गांजा और 4 किलो चरस के साथ पकड़ा था जिसकी कीमत तकरीबन 22 लाख बताई जा रही है। राजधानी में नशे का कारोबार करने वाला यह केवल एक गिरोह है।
सूत्रों के मुताबिक, ऐसे तकरीबन 20 अन्य गिरोह संचालित हैं जो बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थों की सप्लाई युवाओं और किशोरों में कर रहे हैं। खास बात यह है कि गिरोह नशीले पदार्थों की सप्लाई नाबालिग बच्चों को कैरियर बनाकर उनके जरिए कराते हैं ताकि किसी को शक न हो।
एसटीएफ के अधिकारी के मुताबिक, नशे का यह कारोबार राजधानी के ज्यादातर निजी शैक्षिक संस्थानों के आसपास होता है। इस कारोबार में कुछ पुराने छात्र भी जुड़े हैं।
पकड़े गए गिरोह के सदस्यों ने बताया कि प्रतिदिन शैक्षिक संस्थानों के आसपास नशे के सामान की खपत करीब 5 से 7 किलो की है जिसकी कीमत करीब 10 से 15 लाख रुपये हैं।
पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए गिरोह के तार नेपाल, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं जहां से चरस और गांजे की खेप आती है।
यह खेप लखनऊ, कानपुर, रायबरेली, उन्नाव व बाराबंकी जैसे जिलों में पहुंचाई जाती है। इसके बाद गिरोह के तीनों सदस्य उसे लखनऊ मंगाकर छात्र-छात्राओं में 20 ग्राम की पुड़िया बनाकर आपूर्ति करते हैं।
इसकी कीमत 2500 से 3000 रुपये के बीच होती है। कभी कभी यह गिरोह नए छात्रों को निशाना बनाने के लिए बिना रुपये लिए भी नशे का सामान देता है।
पुलिस के मुताबिक, राजधानी में छोटे-बड़े 20 से अधिक गिरोह सक्रिय है। कइयों को पुलिस ने जेल भी भेजा है। लेकिन उनके सहयोगी इस कार्य को लगातार कर रहे हैं। फिलहाल पांच ऐसे गिरोहों के बारे में जानकारी जुटाकर नजर रखी जा रही है।
हाई सोसाइटी की पसंद है मैंगो व शिलांग
पुलिस के मुताबिक, गांजा व चरस बेचने के लिए कारोबारियों ने कोड वर्ड दे रखे हैं। जैसे मैंगो, शिलांग, कली और बुरादा। सबसे महंगा गांजा मैंगो व शिलांग के नाम से बिकता है। शिलांग 4000 रुपये प्रति पुड़िया तो मैंगो 3500 रुपये में बिकता है। इसकी डिमांड हाई सोसायटी में ज्यादा है। वहीं कली 500 और बुरादा 200 रुपये प्रति पुड़िया बेचा जाता है। पकड़ें गए नशे के कारोबारियों ने बताया, मैंगो नाम से बिकने वाला गांजे का आकार आम की तरह होता है। वहीं शिलांग के नाम से बिकने वाला क्रिसमस ट्री की तरह। एसटीएफ की पूछताछ में पकड़े गए तीनों आरोपियों ने कुबूला कि वे गांजे व चरस की आपूर्ति हाई सोसायटी में भी करते थे। यहां ज्यादा मात्रा में नशीले पदार्थ की खपत के साथ ही दाम भी अच्छा मिलता है। ज्यादातर ऐसे लोगों को गांजा व चरस की आपूर्ति बड़े होटलों में होने वाली पार्टियों में की जाती है। सोसायटी के जो लोग संपर्क में रहते थे, उनकी डिमांड पर गांजा व चरस बताए गए होटल के आसपास पहुंचा दी जाती है। सप्लाई से एक घंटे पहले ही ऑनलाइन भुगतान भी ले लेते थे। इस तरह की सोसायटी में एक महीने में 10 से 15 बार नशीले पदार्थों की आपूर्ति यह गिरोह करता था।
एमिटी से इंजीनियरिंग कर चुका है सरगना
पुलिस के मुताबिक, इस गिरोह का सरगना आरुष सिंह हैं जिसने एमिटी से 2015-16 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। वहीं, दूसरे साथी सुनील यादव ने निजी संस्थान से बीएड किया है। पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए तीनों आरोपी विनयखंड में चोरी के आरोप में 2009 में जेल जा चुके हैं। उस वक्त तीनों नाबालिग थे। वहां से छूटने के कुछ दिनों के बाद नशे के सामान को बेचने में जुट गए। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने दो साल पहले विभूतिखंड इलाके के कठौता झील के पास ठिकाना बनाया था। किराए का फ्लैट लिया। इसके बाद यहीं से नशे का कारोबार करने लगे। यहीं से एमिटी कॉलेज जैसे कई कॉलेजों को निशाना बनाते थे। इनका नेटवर्क चिनहट, विभूतिखंड, गुडंबा, सुल्तानपुर रोड, रायबरेली रोड पर स्थित कई कॉलेज में है।
नए छात्र होते हैं निशाने पर, ऑनलाइन भुगतान भी
नशे के कारोबारी छात्रावासों या उसके आसपास के इलाके में कार से पहुंचते थे। वहां कुछ नाबालिग बच्चों को टारगेट करते थे जिनको दो से तीन बार पुड़िया पहुंचाने के लिए प्रयोग करते थे। बदले में उनको दो से तीन सौ रुपये देते थे। इस तरह किसी को संदेह भी नहीं होता है। बस नाबालिग को इतना बताया जाता है कि इस रंग के कपड़े में लड़का या लड़की वहां मौजूद है, उसे पुड़िया देकर जाना है। वहीं पुड़िया लेने वाला मिलते ही मोबाइल पर सूचना दे देता है। गिरोह के पास मोबाइल नंबर पर कॉल आने पर दाम तय होते थे जिसका भुगतान ऑनलाइन कराया जाता था। इसके बाद 30 से 45 मिनट में लखनऊ के किसी कोने में सामान की आपूर्ति कर दी जाती है। नए नंबर से फोन आने पर नशे के कारोबारी उससे बात नहीं करते हैं।