एक महीने की योगी सरकार ने जो इरादे दिखाए हैं उनसे चुनाव के दौरान भाजपा की तरफ से किए गए वादों पर अमल का संदेश मिल रहा है। योगी आदित्यनाथ एजेंडे पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं।
पार्टी के लोक कल्याण संकल्प पत्र के संकल्पों को पूरा करने की कोशिश में जुटे भी दिखाई दिए। वादे के मुताबिक कई काम भी शुरू हुए। पर, फैसलों में कुछ कमियां भी नजर आ रही हैं। हालांकि किसानों से लेकर मजदूरों तक को राहत देने की कोशिश की गई है लेकिन यह सवाल अपनी जगह हैं कि वादों को पूरा करने में इरादा आधा-अधूरा क्यों है।
कर्जमाफी पर सीमा
कैबिनेट की पहली बैठक में लघु एवं सीमांत किसानों की कर्जमाफी का वादा पूरा करने के लिए पहले 17 दिन की मगजमारी फिर एक लाख तक की सीमा तक ही कर्जमाफी ने सरकार के सरोकारों पर सवाल भी खड़े कर दिए। यह प्रश्न भी उठने लगे कि सरकार क्या दूसरे वादों को पूरा करने के लिए भी ऐसे ही शार्टकट तलाशेगी।
एंटी रोमियो स्क्वॉयड का गठन, अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध जैसे फैसलों ने मुख्यमंत्री की तरफ से जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की उम्मीद तो बंधाई लेकिन आधी-अधूरी। जिस तरह आधी-अधूरी तैयार एडवांस लाइफ सपोर्ट (एएलएस) एंबुलेंसों के बेडे़ का मुख्यमंत्री के हाथों लोकार्पण करा दिया गया, उससे एक बार फिर यह बात साफ हो गई कि रंग बदलने में माहिर नौकरशाही अपनी फितरत से बाज आने वाली नहीं है।
योगी सरकार पर भी हावी हो गई नौकरशाही !
आईपीएस हिमांशु, योगी आदित्यनाथ
नौकरशाही पूर्व की सरकारों की तरह इस सरकार पर भी हावी हो गई है। जनता से तमाम वादे करके आए सत्ता में बैठे लोग नौकरशाहों की नजर से देखने लगे हैं। चौदह सालों बाद सत्ता में आई भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा मुख्यमंत्री के कमरे में कब्जा करने की घटना से नेताओं की हनक में हड़बड़ी भी सामने आई हालांकि रणनीतिकारों और योगी ने कुशलतापूर्वक इस हड़बड़ी को गड़बड़ी में तब्दील होने से बचा लिया।
पर, मुख्यमंत्री की हिदायत के बावजूद कई मंत्रियों ने जिस तरह अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने में हीलाहवाली की और इसी राह पर कई अधिकारी भी दिखे। उससे यह जाहिर हो ही गया कि तमाम दावों के बावजूद नई सरकार की साख सवालों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। कहा चाहे जो जा रहा हो लेकिन उन्हीं की सरकार में उन्हें चुनौती देने वाले मौजूद हैं।
जब योगी ने 19 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो यही लग रहा था कि दूसरी सरकारों की तरह शाम तक न सिर्फ कैबिनेट की पहली बैठक हो जाएगी, किसानों की कर्जमाफी सहित कई महत्वपूर्ण निर्णय ले लिए जाएंगे। पिछली सरकारों की तरह अखिलेश राज में खास पदों पर बैठे अफसर शाम तक किनारे कर दिए जाएंगे। नए अधिकारियों की तैनाती हो जाएगी। डीजीपी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी नए चेहरे आ जाएंगे। इसको लेकर अटकलें भी चलीं। उन अधिकारियों के नामों पर कयासबाजी भी हुई जो भाजपा के दुलारे हो सकते थे। पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की कि जिस तरह उनके रूप में एक मठ के संन्यासी महंत के सत्ता की सियासत में उभरने व मुख्यमंत्री बनने की नई परंपरा शुरू हो रही है, उसी तरह सूबे में कामकाज की भी कई पुरानी परंपराएं टूटेंगी।
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उनके नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार यह साबित करके दिखाएगी कि नई कार्यसंस्कृति के लिए पुराने अफसरों का हटाना जरूरी नहीं है बल्कि उनकी कार्यसंस्कृति को बदलना आवश्यक है। यह बात दीगर है कि इस स्थिति ने यह सवाल भी उठा दिया है कि भाजपा ने चुनाव के दौरान जिन पर समाजवादी पार्टी के एजेंट के रूप में काम करने का आरोप लगाया, सत्ता में आने पर उन्हीं पर भरोसा क्यों और किसलिए किया जा रहा है।