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2017 में चुनावी मुद्दा बन सकता है यादव सिंह प्रकरण

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यादव सिंह की गिरफ्तारी के साथ ही निकट भविष्य में इस घोटाले से जुड़े कुछ नए खुलासे की उम्मीद बढ़ गई है। इस केस को दबाने के पीछे छिपे चेहरों के बेनकाब होने की उम्मीदें जताई जा रही हैं।
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सवाल ये उठ रहे हैं कि एक जूनियर इंजीनियर के चीफ इंजीनियर और फिर करीब 900 करोड़ का स्वामी बन जाने के पीछे जिन राजनीतिक और गैर राजनीतिक लोगों की भूमिका है, सीबीआई क्या आने वाले दिनों में उन चेहरों को भी बेनकाब कर पाएगी?

अगर ऐसा होता है तो 2017 के चुनावी समर में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है। प्रदेश का पिछला चुनाव भी भ्रष्टाचार के बड़े मुद्दे के साये में लड़ा गया था।यादव सिंह को जिस स्तर का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त रहा है, उसे देखते हुए ताज्जुब नहीं कि सीबीआई जांच में कई नए तथ्य सामने आएं।
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तफ्तीश में अगर किसी गैर भाजपाई नेता की तरफ सीबीआई के कदम बढ़े तो निश्चित रूप से केंद्र सरकार पर सीबीआई के राजनीतिक दुरुपयोग के आरोप लगे बिना नहीं रहेंगे।भाजपा भी इस पर कुछ न कुछ प्रतिक्रिया जरूर व्यक्त करेगी। ये आरोप-प्रत्यारोप सूबे की सियासत को प्रभावित किए बिना नहीं रहेंगे।

यादव सिंह 2012 के विधानसभा चुनाव के पहले से ही भाजपा के निशाने पर रहा था। भाजपा नेता किरीट सोमैया ने यादव सिंह के बहाने बसपा सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती पर निशाना साधा था।

मायावती और उनके भाई से भी थे यादव सिंह के संबंध

उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के भाई आनंद कुमार और बसपा सरकार में काफी प्रभावी माने जाने वाले सतीश मिश्र के साथ कारोबारी रिश्तों की बात दस्तावेजी सुबूतों के साथ सार्वजनिक की थी।

आरोप लगाया था कि आनंद कुमार व सतीश मिश्र ने फर्जी कंपनियां बनवाईं। आनंद कुमार समूह में शामिल इन कंपनियों में एक का शेयर दूसरे को ऊंचे दामों पर बिक्री दिखाकर 10,000 करोड़ रुपये का घोटाला किया गया।

भाजपा ने यह भी आरोप लगाया था कि आनंद कुमार समूह में यादव सिंह भी शामिल है। उसने मनमाने ढंग से अपने व अपने परिवारीजनों के नाम से दर्जनों कंपनियां बनाई हैं और उनके जरिये हजारों करोड़ का घोटाला किया है।
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शुरू होंगे आरोप-प्रत्यारोप

प्रदेश में 2012 में सत्ता बदलने के बाद भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने सदन में सरकार पर यादव सिंह को बचाने की साजिश रचने का आरोप लगाया। यादव सिंह की गिरफ्तारी के लिए भाजपा ने प्रदर्शन भी किया था।

जाहिर है, अब भाजपा यह बताने की कोशिश जरूर करेगी कि सपा सरकार यादव सिंह को बचाना चाहती थी। इसीलिए उसने उच्च न्यायालय द्वारा यादव सिंह की सीबीआई जांच कराने के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी दाखिल की थी।

तर्क दिया था कि प्रदेश सरकार ने न्यायिक जांच आयोग बना दिया है। इसलिए सीबीआई जांच की जरूरत नहीं है।

सियासी मुद्दा बनने की ये हैं वजहें

दरअसल, भाजपा का सबसे बड़ा लक्ष्य 2017 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में पार्टी का परचम लहराना है। यह सपा और बसपा के कमजोर होने से ही हो सकता है। भाजपा के इस मकसद को पूरा करने में यादव सिंह मामला काफी मददगार हो सकता है।

वह इसके जरिये सपा व बसपा दोनों पर दबाव बना सकती है। यही नहीं, पर्दे के पीछे इन दोनों पार्टियों को भविष्य में अपने इशारे पर चलने को मजबूर भी कर सकती है।
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