रीढ़ की हड्डी में कैंसर, डॉक्टर करते रहे बोन टीबी का इलाज
लखनऊ। केजीएमयू के डॉक्टरों की लापरवाही थमने का नाम नहीं ले रही है। रीढ़ की हड्डी में हुए कैंसर को दस माह तक डॉक्टर नहीं पकड़ पाए। डॉक्टर, पहले तो मरीज की नस दबने और फिर बोन टीबी की दवा चार माह तक खिलाते रहे। मर्ज बढ़ने पर दो-दो बार एमआरआई कराई गई। इसके बाद बायोप्सी कराई गई। जांच में मरीज को कैंसर की पुष्टि हुई है। इस दौरान इलाज के नाम पर करीब पांच लाख रुपये खर्च हो गए। तीमारदारों ने केजीएमयू डॉक्टरों से शिकायत की है। डॉक्टरों ने उसे रेडियोथेरेपी विभाग रेफ र कर दिया है। अब वहां डॉक्टर उसे भर्ती नहीं ले रहे हैं। वह तीन दिन से रेडियोथेरेपी विभाग के बरामदे में स्ट्रेचर पर पड़ा तड़प रहा है।
हरदोई निवासी सुनील (24) को करीब ढाई साल पहले रीढ़ की हड्डी में चोट लगी थी। पहले जिला अस्पताल हरदोई में इलाज कराया मगर वहां कोई फायदा न हुआ। डॉक्टरों ने मामला गंभीर देख उसे करीब 10 माह पहले केजीएमयू रेफर कर दिया। यहां न्यूरोलॉजी विभाग की ओपीडी में मरीज को पहले दिखाया। जहां डॉक्टरों ने एमआरआई कराकर नस दबे होने की बात कहकर दवा शुरू कर दी। करीब तीन माह तक यही दवा चलती रही मगर कोई फायदा न हुआ। मां विद्यावती का कहना है कि बीमारी काबू आने की बजाए बढ़ने लगी। इसके बाद डॉक्टरों ने हड्डी की टीबी की आशंका जाहिर की। बोन टीबी का इलाज शुरू कर दिया। इलाज के बावजूद मरीज की हालत गंभीर होती चली गई। मरीज चलने-फिरने में असमर्थ हो गया। बृहस्पतिवार को मरीज तीन दिन से रेडियोथेरेपी विभाग के बाहर बरामदे में भर्ती होने के इंतजार में पड़ा है। मां विद्यावती का कहना है कि डॉक्टरों ने मर्ज पहले पकड़ लिया होता तो बेटे की हालत गंभीर न होती।
बायोप्सी में हुई कैंसर की पुष्टि
दस माह चले उपचार में करीब पांच लाख रुपश्े परिवारीजनों ने खर्च कर दिए। महंगी जांचें तक डॉक्टरों ने करा डालीं मगर मर्ज नहीं पकड़ पाए। जांच में ट्यूमर नजर आया। इसकी बायोप्सी जांच कराई गई। बायोप्सी में कैंसर की पुष्टि हुई। परिवारीजनों ने गलत इलाज का आरोप लगाया तो डॉक्टर ने मरीज को रेडियोथेरेपी विभाग में ठेल दिया जहां पर डॉक्टर मरीज को भर्ती नहीं कर रहे।
खून न मिलने पर भर्ती करने से इन्कार
मां विद्यावती का कहना है कि बेटे को भर्ती कराने के लिए शताब्दी फेज-दो में रुके हुए हैं। आरोप हैं कि डॉक्टर मरीज के चार लिए यूनिट खून की व्यवस्था करने बाद भी भर्ती करने की बात कह रहे हैं। परिवारीजनों में सुनील की मां व पत्नी हैं। दोनों का हीमोग्लोबिन बहुत कम है। खून न मिलने से उसे भर्ती नहीं किया जा रहा है। मां-पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है।
पहली स्टेज में कैंसर की पुष्टि मुश्किल
कई मरीजों में पहली या दूसरी स्टेज में पहुंचा कैंसर जांच में साफ नहीं होता है। ऐसे में डॉक्टर बिना सटीक पुष्टि किए कैंसर की दवा नहीं शुरू करते हैं। यह मरीज की सेहत के लिए घातक हो सकता है। रेडियोथेरेपी विभाग में किस डॉक्टर की यूनिट में मरीज का उपचार चल रहा है। इसकी जांच कराई जाएगी। जांच में दूसरे विभागों के डॉक्टरों की लापरवाही सामने आती है तो कार्रवाई के लिए संस्तुति कराई जाएगी।
- डॉ. सुधीर सिंह, प्रवक्ता, केजीएमयू