21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाया जाता है। कठपुतलियों के खेल मेलों से लेकर गांव-मोहल्लों में अक्सर देखने को मिलते थे, जो बेहद मनोरंजक हुआ करते थे। लेकिन पहले टीवी और फिर इंटरनेट युग ने समय के साथ इन कठपुतलियों को बच्चों से दूर कर दिया। लखनऊ में जन्मी इस कठपुतली कला को चंद कलाकार अब भी जीवंत बनाए हुए हैं, उनमें से एक हैं प्रदीप नाथ त्रिपाठी।
प्रदीप नाथ ने स्पेन, जर्मनी, डेनमार्क, फ्रांस के साथ देश में सैकड़ों पुतुल समारोह में प्रदर्शन किए। इसके लिए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। प्रदीप नाथ ने इस लुप्त होती लोकप्रिय विधा को बचाने के लिए प्रयास किए जो आज भी जारी हैं।
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लगभग 200 साल पहले लखनऊ में ही नवाबों के जमाने में कहानी-किस्सों से निकलकर आई थीं गुलाबो-सिताबो। कहानी के अनुसार गुलाबो-सिताबो आपस में सौतन हैं। उन्हीं के बीच आए दिन घर-गृहस्थी को लेकर वाद-विवाद और उलाहने कहानियों में उभरकर आए थे। उन्हीं पर किस्से बने और कठपुतलियों के माध्यम से घर-घर में लोकप्रिय हो गई।