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विश्व कठपुतली दिवस: यादों में आज भी बसी हैं 'गुलाबो-सिताबो', लखनऊ में जन्मी कला विश्वभर में हुई प्रासंगिक

Fri, 21 Mar 2025 03:31 PM IST
भूपेन्द्र सिंह अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ

सार

साग लाई पात लाई और लाई चौलईयां, सास बहू छौंकन बैठीं, नाक लईगा कौव्वा... गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं...। ये पंक्तियां हम सबने बचपन में खूब सुनी होंगी।
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कठपुतलियों के साथ प्रदीप नाथ त्रिपाठी। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाया जाता है। कठपुतलियों के खेल मेलों से लेकर गांव-मोहल्लों में अक्सर देखने को मिलते थे, जो बेहद मनोरंजक हुआ करते थे। लेकिन पहले टीवी और फिर इंटरनेट युग ने समय के साथ इन कठपुतलियों को बच्चों से दूर कर दिया। लखनऊ में जन्मी इस कठपुतली कला को चंद कलाकार अब भी जीवंत बनाए हुए हैं, उनमें से एक हैं प्रदीप नाथ त्रिपाठी।

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लखनऊ के ही प्रदीप नाथ ने बताया कि उन्होंने 1984 में रंगमंच से इसकी शुरुआत की। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय पुतुल कलाकार सुरेश दत्ता के साथ अन्य पुतुल कला विशेषज्ञों से इस विधा की ट्रेनिंग ली। उन्हें गुलाबो सिताबो पर भारत सरकार की जूनियर फेलोशिप भी प्राप्त है। उन्होंने परंपरागत पुतुल कलाकार उस्ताद भूरे से इस एकल विधा की ट्रेनिंग प्राप्त कर मयूर पपेट थिएटर की स्थापना भी की।

लोकप्रिय विधा को बचाने के लिए प्रयास आज भी जारी हैं

प्रदीप नाथ ने स्पेन, जर्मनी, डेनमार्क, फ्रांस के साथ देश में सैकड़ों पुतुल समारोह में प्रदर्शन किए। इसके लिए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। प्रदीप नाथ ने इस लुप्त होती लोकप्रिय विधा को बचाने के लिए प्रयास किए जो आज भी जारी हैं।

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उन्होंने बताया कि 16 जून से संगीत नाटक अकादमी में वे कठपुतली कार्यशाला का आयोजन कर रहे थे। 21 मार्च को गुलाबो-सिताबो और अलादीन कठपुतलियों को मंचन संगीत नाटक अकादमी में किया जाएगा। इन प्रतिभागियों में अग्नि सिंह, निहारिका, जूही, कोमल, चंद्रभाष और अंकित मोदनवाल शामिल हैं।

200 साल पुरानी है गुलाबो-सिताबो की कहानी

लगभग 200 साल पहले लखनऊ में ही नवाबों के जमाने में कहानी-किस्सों से निकलकर आई थीं गुलाबो-सिताबो। कहानी के अनुसार गुलाबो-सिताबो आपस में सौतन हैं। उन्हीं के बीच आए दिन घर-गृहस्थी को लेकर वाद-विवाद और उलाहने कहानियों में उभरकर आए थे। उन्हीं पर किस्से बने और कठपुतलियों के माध्यम से घर-घर में लोकप्रिय हो गई।

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