भारतीय समाज में एकल परिवारों का चलन बढ़ता जा रहा है। संयुक्त परिवारों की यादें सिर्फ दादा-दादी और नाना-नानी के किस्सों तक ही सीमित रह गई हैं। राजधानी लखनऊ में कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो संयुक्त परिवार की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने बताया कि आखिर वे किस तरह से एकजुट रहे।
बात सामने आई कि बिना किसी भेदभाव के परिवार के मुखिया की निर्णय लेने की क्षमता अहम है। घरवालों की आपसी सूझबूझ से परिवार में मनमुटाव और विवाद को दूर किया जा सकता है। इन परिवारों ने माना कि खाने की मेज पर ही वे तमाम विवाद हल कर लेते हैं।
दलजीत सिंह का परिवार।
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निराला नगर में दलजीत सिंह सियाल और उनके बड़े भाई बलबीर सिंह सियाल का तकरीबन 32 सदस्यीय परिवार रहता है। दलजीत के दो व बलबीर के तीन बेटे हैं। संडीला स्थित सियाल मैन्युफैक्चरिंग के एमडी दलजीत सिंह के बेटे सुरेंद्र पाल सिंह ने बताया कि परिवार के कुछ लोग नौकरी व अन्य व्यवसाय के लिए बाहर गए हैं।
बलबीर सिंह इंद्रप्रस्थ बिल्डर प्रालि के एमडी हैं। सुरेंद्र पाल का कहना है कि परिवार में अगर कभी कोई मनमुटाव हुआ भी तो शाम को खाने की मेज पर ही सभी समस्याओं का हल निकल जाता है। हमारे यहां छोटे बड़ों से माफी मांगकर सभी मसलों का हल निकाल लेते हैं।
सुभाष चंद जैन का परिवार।
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किचन की किच-किच नहीं, रस से भरी है हमारी रसोई
निराला नगर निवासी 72 वर्षीय सुभाष चंद जैन और उनकी 69 वर्षीय पत्नी मंजू रानी जैन के तीन बेटे-बहुएं और उनके बच्चों समेत 14 सदस्य एक ही छत के नीचे हंसी-खुशी रहते हैं। उनका कहना है कि हमारे यहां किचन की किच-किच नहीं होती, बल्कि रस से भरी एक ही रसोई है, जहां पूरे परिवार का खाना पकता है।
सभी साथ में ही भोजन करते हैं। सुभाष चंद्र के सबसे छोटे बेटे विपिन ने बताया कि उनका कंस्ट्रक्शन व प्लास्टिक फर्नीचर का कारोबार है। कभी मनमुटाव जैसी स्थिति आई तो बड़ों की मौजूदगी में समझदारी से सभी मसलों के हल निकाल लिए जाते हैं।
मुखिया करे निष्पक्ष फैसला, छोटे करें अनुसरण
चित्रगुप्तनगर वार्ड के पूर्व पार्षद हरसरन लाल गुप्ता का 32 सदस्यीय परिवार सुभाषनगर में एक ही घर में रहता है। चार बार पार्षद रह चुके हरसरन लाल का कहना है कि परिवार में किसी भी विवाद की स्थिति में मुखिया निष्पक्ष फैसला करता है।
सभी छोटे उनकी बात मानते हैं। इस तरह से कोई दिक्कत नहीं आई। परिवार की एकजुटता के लिए आपसी समझदारी बहुत जरूरी है। मेरे पिता राम आसरे गुप्ता का 10 वर्ष पूर्व स्वर्गवास हुआ था। तभी से मैं पूरे परिवार को एकजुटता का पाठ पढ़ा रहा हूं।