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Lucknow News: लोहिया में ऑटोइम्यून डिसऑर्डर पर हुई कार्यशाला

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लोहिया संस्थान।
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लखनऊ। त्वचा पर दाग-धब्बे, बालों का झड़ना और जोड़ों में दर्द की परेशानी हो तो सर्तक हो जाए। यह ऑटोइम्यून डिजीज ल्यूपस हो सकती है। त्वचा संबंधी यह गंभीर बीमारी लिवर, किडनी और दिल को नुकसान पहुंचा सकती है। यह जानकारी लोहिया संस्थान में पैथोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. नुजहत हुसैन ने दी। वह शनिवार को संस्थान प्रेक्षागृह में पैथोलॉजी विभाग की ओर से हुई डीकोडिंग ऑटोइम्यून डिसऑर्डर्स सेमिनार को संबोधित कर रही थीं।
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डॉ. नुजहत हुसैन ने कहा कि ल्यूपस बीमारी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अधिक होती है। कम उम्र में महिलाएं बीमारी की जद में आ जाती हैं। महिलाओं में ल्यूपस को समय पर पहचान जरूरी है। जांच व समय पर इलाज से बीमारी ठीक हो सकती है। इलाज के दौरान कई बार बीमारी की जांच जरूरी है। डॉक्टर की सलाह पर जांच करानी चाहिए।
डॉ. नजुहत हुसैन ने कहा कि थायराइड (हाइपोथॉयराइड) की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इसकी वजह से मरीज को कमजोरी महसूस होती है। बीमारी की पहचान होने पर डॉक्टर की सलाह पर स्टेरॉयड दवा चलाने की जरूरत होती है। इससे बीमारी के जल्दी काबू में आने की उम्मीद बढ़ जाती है। डॉ. नुजहत हुसैन ने कहा कि ऑटोइम्यून विकार तब होते हैं जब रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हाेती है। ये रोग जोड़ों, त्वचा, थायरॉइड, गुर्दे, लिवर, तंत्रिकाओं और रक्त कोशिकाओं सहित कई अंगों को प्रभावित कर सकते हैं। मरीज को थकान, बुखार और जोड़ों के दर्द से लेकर त्वचा में परिवर्तन, वजन में उतार-चढ़ाव और अंग शिथिलता तक हो सकता है।
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डॉ. सिद्धार्थ दत्ता गुप्ता ने कहा कि हेपेटाइटिस और ऑटोइम्युन हेपेटाइटिस में अंतर जाना जरूरी है। यह समस्या महिलाओं को ज्यादा होती है। इसमें पीलिया होता है। बीमारी की पहचान मुश्किल होती है। बीमारी की पहचान व इलाज में देरी से लिवर फेल तक हो सकता है। ऐसे में खून की जांच से काफी हद तक बीमारी की पहचान की जा सकती है। इसमें बिलूरोबिन, सीरम टाइटर और लिवर की बायोप्सी आदि शामिल हैं।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष ने कहा कि इस तरह के सेमिनार से डॉक्टरों में ज्ञान का आदान-प्रदान होता है। नई तकनीक से डॉक्टर रु-ब-रु होते हैं। इसका सीधा फायदा मरीजों को मिलता है। कार्यक्रम में निदेशक डॉ. सीएम सिंह, डीन डॉ. प्रदुमन सिंह समेत अन्श्रय डॉक्टर मौजूद रहे।
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