फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Women's day special: अलग है इन लखनवी लड़कियों का पैशन, जानें- इनके अनूठे सफर के बारे में

Thu, 08 Mar 2018 10:11 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
महिला दिवस - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

खुली आंखों में ख्वाब बुनती नई पौध बेलौस अंदाज में आगे बढ़ रही है। इन्हें फिक्र जमाने की है। भरोसा खुद पर है। किताबी बातों से कहीं ज्यादा आगे जाकर इन्होंने कुछ करने की ठान ली है। कहते हैं युवा पीढ़ी को नौकरी चाहिए, पर इनमें से कुछ तो ऐसी हैं, जिन्हें कॉरपोरेट की नौकरी का मोह बांधे नहीं रख सका। अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी, सिर्फ अपने पैशन को पूरा करने के लिए। वहीं कुछ ने इंजीनियर-डॉक्टर या फिर टीचर बनने के बजाय, कुछ अलग सा जॉब प्रोफाइल चुना। बिना एनजीओ, बिना ग्रांट ये अपने दम पर आगे बढ़ रही हैं, मगर समाज को साथ लेकर, उसकी बेहतरी के लिए। आइए जानते हैं लखनवी लड़कियों के इस अनूठे सफर के बारे में...

विज्ञापन

आयशा मलिक (कंसल्टेंट इनोवेशन डिपार्टमेंट, एकेटीयू) - फोटो : amar ujala
आयशा मलिक (कंसल्टेंट इनोवेशन डिपार्टमेंट, एकेटीयू): अपना बॉस खुद बनने की दे रहीं सीख
छोटी सी उम्र और सोच आसमान सी अनंत तक विस्तार लिए। अपनी टीम के साथ मिलकर युवाओं को संदेश देती फिर रहीं कि ‘डू नॉट बी जॉब सीकर्स, बी अ जॉब क्रियेटर्स’। इनके कंधों पर है जिम्मेदारी युवाओं के भीतर इनोवेटर बनने का जज्बा पैदा करने की। दरअसल, आयशा मानती हैं कि विकल्प बहुत हैं, पर लोग उस पर अमल नहीं कर पा रहे। इसका कारण मनोवैज्ञानिक हैं, यानी हनुमानजी को भी उनका बल याद दिलाया गया था। कहती हैं कि बस इसी सोच के साथ हम आगे बढ़ रहे हैं। 2013 में बायोटेक्नोलॉजी में ग्रेजुएशन करने के बाद सिविल सर्विसेज की तैयारी करने लगीं। कहती हैं कि मैं समाज के लिए कुछ करना चाहती हूं, पर इसके लिए वह एनजीओ बनाना जरूरी नहीं। कहती हैं कि आप शासन-प्रशासन का हिस्सा बनकर समाज को काफी कुछ दे सकते हैं। गर्ल्स राइजिंग प्रोजेक्ट की एरिया एंबेसडर रह चुकीं आयशा कहती हैं कि हमने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर ‘फूड फॉर थॉट’ कैंपेन चलाया था। इसके तहत हम शनिवार और रविवार को वंचित बच्चों को पढ़ाते थे। एकेटीयू से जुड़ने के बाद हम कलाम स्कूल के जरिए निर्धन बच्चों को पढ़ा रहे थे। फिलहाल यह स्कूल बंद है, जिसे फिर से शुरू करना है।

ये है इनका लाइफ मंत्रा- जब तक जिओ, समाज को कुछ देने की सोचो

मकसद, हर किसी के जीवन में निखार लाना

चार्वी मोहन व पल्लवी - फोटो : amar ujala
चार्वी मोहन (सीनियर प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव, क्वालिटी अश्योरेंस एंड लाइफ स्किल ट्रेनर)
ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ना, उनके जीवन में बदलाव लाने की सोच लिए चार्वी मोहन केंद्र सरकार के कौशल विकास कार्यक्रम का हिस्सा बन गईं। कहती हैं कि काम बहुत है, करने वाले कम हैं, क्योंकि उनमें स्किल का अभाव है। हम गांव-गांव से ढूंढ कर उन युवाओं को निकालते हैं, जिन्होंने किसी वजह से स्कूल छोड़ दिया था। पहले उन्हें काम करने के लिए प्रेरित करते हैं, फिर उनमें कौशल विकास करते हैं। चार्वी कहती हैं कि लखनऊ में काफी संभावनाएं हैं। अगले साल तक मेरी योजना एक लाइफ स्कूल एकेडमी खोलने की है, खासकर महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने पर फोकस होगा। कहती हैं कि थियेटर से जुड़ी रही हूं, इसलिए लोगों से बहुत जल्दी घुलमिल जाती हूं और यही वजह है, जिसने मुझे यहां तक पहुंचाया।

बात पते की - ‘टच द लाइफ’ का लक्ष्य लेकर चल रही चार्वी ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ना चाहती हैं।

बूंद-बूंद बचाने अमेरिका  से लौटीं
पल्लवी (इंजीनियर)
अमेरिका में पढ़ाई के बाद यूके, नार्वे में काम रही थीं, पर उन्हें तो लखनऊ बुला रहा था। एक जुनून दिल में लिए चली आईं और अब पानी बचाने और जल शोधन प्रक्रिया के प्रति लोगों को जागरूक कर रही हैं। पेशे से इंजीनियर पल्लवी ने एक ऐसी कंपनी बनाई है, जो लोगों को वाटर ट्रीटमेंट सिस्टम के आसान उपकरण उपलब्ध कराती है। इस पहल के लिए उन्हें 2017 में वीेमेन एंपावरमेंट क्वेस्ट में देशभर की 10 महिलाओं में चुना गया। पल्लवी कहती हैं कि भारत में पानी नहीं सोच की कमी है। यहां जल प्रबंधन के लिए सोच नहीं के बराबर है। आने वाले समय में हमें पानी संकट का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले कि हमें दिक्कतें झेलनी पड़ें, तकनीक की मदद ले लेनी चाहिए। हमारी कंपनी रीयल टाइम रिन्यूएबल्स (आरटीआर) एक प्रक्रिया पर काम रही है, जिसमें पब्लिक, सरकार और इंडस्ट्री, तीनों को हम साथ लेकर आए हैं। यही भारत को पानी की कमी वाला देश बनने से रोकेगा।

पैशन- लोगों को सोचने पर मजबूर करना कि पानी बचाइए।

लोगों को सिखा रहीं प्रॉब्लम सॉल्व करना

अनुजा राय व स्तुति मिश्रा - फोटो : amar ujala
अनुजा राय (कॉरपोरेट ट्रेनर, साइकोथेरेपिस्ट)
12वीं तक की पढ़ाई कोलकाता में हुई। इसके बाद ग्रेजुएशन, पीजी और एमबीए अमेठी और तमिलनाडु से किया। कोलकाता से यूपी आने के बाद कॅरिअर की दिशा बदल गई। कई अवसर सामने आए पर चुनी अलग राह। पढ़ना था माइक्रोेबायोलाजी पर ग्रेजुएशन किया सोशियोलाजी, एजुकेशन और होमसाइंस में। अनुजा अमेठी के एक स्कूल में टीचर बन गईं, इसके बाद इंदिरा गांधी स्कूल आफ नर्सिंग में कम्युनिकेटेड इंग्लिश ट्रेनर। यहीं से राह खुली ट्रेनर बनने की और महज 22 साल की उम्र में अनुजा बन गईं काॅर्पोरेट ट्रेनर। 2012 से अब तक 5000 टीचर्स को प्रशिक्षित कर चुकी हैं। इसमें बीटीसी, बीएड और कार्यरत शिक्षक-शिक्षिकाएं शामिल हैं। 1000 बैंक अधिकारियों को मोटीवेशन का पाठ पढ़ा चुकी हैं अनुजा। वह लोगों को सिखाती हैं कि अंग्रेजी कैसे बोलते हैं, बच्चों से कैसे बात की जाती है, कैसे उनकी प्रॉब्लम सॉल्व की जाती है। इसके अलावा नौकरी के प्रति बोझ जैसी धारणा को अधिकारियों के मन से निकालना। मोटीवेशन मॉडल डवलप किया, जिसे कई बैंक अपना चुके हैं। उन्होंने ओडीसी डांस में विशारद की उपाधि भी ली है।

पॉजीटिव एटीट्यूड- नौकरी या फिर कोई भी काम बोझ समझ कर न करें। खुद में जुनून पैदा कीजिए।

धरोहरों को संजोने के लिए बढ़े कदम
स्तुति मिश्रा (आर्कियोलॉजिस्ट)
इन दिनों लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों में एक स्मार्ट सी लड़की देसी-विदेशी पर्यटकों से घिरी दिख जाती है। कभी वह रेजीडेंसी के इतिहास को दोहराती है, अगले ही पल इमामबाड़े की खूबसूरती को शब्दों में ढाल बयां करने लगती है। उसकी उम्र से कई गुना बड़े पर्यटक लखनऊ का इतिहास यूं विस्तार से बताते देख आश्चर्य में पढ़ जाते हैं। जी, हां कुछ ऐसा ही अंदाज है शहर की धरोहरों की रक्षक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहीं स्तुति मिश्रा का। स्कूलिंग लखनऊ में, फिर मास्टर्स इन आर्कियोलॉजी एंड हेरिटेज मैनेजमेंट दिल्ली से करने के बाद कुछ समय तक दिल्ली में ही काम किया। फिर लखनऊ लौटीं, क्योंकि उन्हें अपनी धरोहरों को न केवल संजोना है, बल्कि उनके महत्व को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाना है। कहती हैं कि मैनेजमेंट की डिग्री लेने के बाद यूनेस्को के प्रोजेक्ट पर काम किया। मेरा स्पेशलाइजेशन राजस्थानी कला में हैं। लखनऊ में हेरीटेज वॉक के जरिए लोगों को अपनी धरोहरों के प्रति संवेदनशील बनाने की कोशिश कर रही हूं।

मेरा प्रयास- बच्चे-बच्चे के मन में अपनी धरोहरों की अहमियत का भाव पैदा करना।

लड़कियों को बना रहीं साहसी

कृति व पूजा राय
कृति (सोशल वर्कर)
कृति के पास एमबीए, एमबीआईएस की डिग्री है। उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा ऑफ आईटी प्रोफेशनल्स प्रैक्टिस भी किया है। आईबीएम, आस्ट्रेलिया में अच्छी जॉब कर रही थीं, पर कुछ समय बाद उसे छोड़ दिया। शादी हुई और फिर लखनऊ लौट आईं। इसके बाद एक बदलाव खुद में लाते हुए उन्होंने बीड़ा उठाया कुछ अलग करने का। बिना किसी प्रचार-प्रसार के उन्होंने आपरेशन मुस्कान के तहत सौ से ज्यादा बच्चों को फैक्ट्री से मुक्त कराया। इसके बाद उन्होंने ऑपरेशन साहस की कमान संभाली और शहर-गांव के स्कूलों में लड़कियों को जागरुक करने का बीड़ा उठा लिया। ‘चुप्पी तोड़ो-खुल कर बोलो’जैसे अभियानों का हिस्सा रहीं कृति कहती हैं कि सच कहूं तो मुझे नौकरी की जरूरत उतनी नहीं थी। मुझे लगा कि जरूरत समाज की लड़कियों में साहस भरने की है, जो मैं नौकरी करके नहीं कर सकती थी। खुश हूं कि अब तक 60 हजार लड़कियों तक जागरूकता का संदेश पहुंचा सकी हूं।

कोशिश- समाज की हर लड़की में भर सकूं साहस, बना सकूं उन्हें निडर।

हर बच्चे को मिले खेल का अधिकार
पूजा राय (आर्किटेक्ट एंड सोशल एंटरप्रेन्योर)
क मल्टीनेशनल कंपनी ने आकर्षक पैकेज पर जॉब ऑफर की। कुछ समय तक किया। एक दिन लखनऊ पापा को फोन पर कहा कि वह लौट रही, क्योंकि उन्हें नौकरी नहीं करनी। मां को पता चला तो आम मम्मियों की तरह नाराज हुईं और बोलीं कि सिर फिर गया है, जो अच्छी-खासी जॉब छोड़ रही। खैर, पूजा को उसकी मंजिल बुला रही थी।
वह बताती हैं कि हम खड़गपुर कॉलेज में पढ़ रहे थे। उसी दौरान, एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में पास की बस्तियों में जाना हुआ। वहां देखा, कि बच्चे खेल रहे हैं, लेकिन उनके पास प्ले ग्राउंड के नाम पर गंदे रास्ते ही हैं। हम लौटे और हमने आसपास से टायर-ट्यूब इकट्ठे किए और बना डाला उस बस्ती के लिए एक आर्टिफिशियल प्ले ग्राउंड। उस मैदान में खेलते बच्चों की मुस्कुराहट ने ही प्रेरणा दी। हम लखनऊ के कुछ स्कूलों, टाटा समूह के लिए वेस्ट मैटेरियल से कम लागत में बच्चों के प्ले ग्राउंड बनाते हैं। इससे होने वाली कमाई वंचित बच्चों के लिए खेल का मैदान बनाने में खर्च की जाती है।

अहा जिंदगी : लाइफ के हर एपिसोड को हिट करना है।
विज्ञापन

विकसित किया स्मार्ट टीचिंग मॉड्यूल

अजीता सिंह व शमीना बानो - फोटो : amar ujala
अजीता सिंह (शिक्षिका)
प्राथमिक विद्यालय की स्मार्ट टीचर, जिसने टीचिंग का एक ऐसा स्मार्ट मॉड्यूल विकसित किया, जो अपने आप में एक मिसाल है। बहती नाक, टाट-पट्टी पर पढ़ाई, सिर्फ मिड-डे मील के लिए बच्चों का स्कूल आना, फटी किताबें, कंधे पर लटका झोला, कभी हाथ में कॉपी-किताब। एक प्राथमिक विद्यालय की परिकल्पना कुछ ऐसी ही है, लेकिन गोसाईंगंज ब्लॉक के प्राइमरी स्कूल सिकंदरपुर अमोलिया की तस्वीर मिसाल है वहां की प्रिंसिपल अजीता सिंह के जुनून की। चयन के बाद पहले उन्नाव और फिर लखनऊ में कार्यभार संभालने के तुरंत बाद से उन्होंने टीचिंग का एक ऐसा स्मार्ट मॉड्यूल विकसित कर डाला कि पांच साल पहले तक जो स्कूल महज कबाड़ घर था, आज मॉडल स्कूल बन चुका है। यहां कक्षा 3 से 5 तक का हर बच्चा लैपटॉप चलाना जानता है। एनटीपीसी से सहयोग लेकर यहां की ऊसर भूमि का ट्रीटमेंट करवाया। आज यहां कम से कम 35 पेड़ लगे हैं। बच्चों को क्राफ्ट की क्लास अलग से दी जाती है, उनकी बनाई चीजों को मेले में बेचकर उनकी आर्थिक मदद भी की जाती है।

कोशिशें जारी रहेंगी : मेरा यकीन ‘द शो मस्ट गो ऑन’ पर है।

छोड़ आईं परदेस
शमीना बानो (इंजीनियर एंड सोशल फाइटर)
बच्चों को आरटीई के तहत दाखिला दिलाने के लिए शहर के प्रतिष्ठित स्कूल के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली शमीना कम्प्यूटर इंजीनियर थीं, काम पसंद नहीं आया तो जॉब छोड़ अमेरिका में मैनेजमेंट कंसल्टेंट बन गईं। कुछ साल तक अमेरिका में रहीं, लेकिन इन चीजों में मन नहीं लगा और भारत लौट आईं। पापा के एयरफोर्स में रहने के कारण देश भर में घूमना हुआ, यूपी इन्हें रास आ गया तो बस यहीं रहने का फैसला किया। शमीना कहती हैं कि अमेरिका में एक प्रोजेक्ट के दौरान यूपी के हालात के बारे में पता चला। बात कुछ करने की आई तो किसी ने मुझे चैलेंज किया कि यदि कुछ करना ही है तो देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में करो, जहां चुनौतियां ज्यादा हैं। बस इसके बाद तो नजरिया बदल गया। यहां आने पर मैंने आरटीई के बारे में जाना, पता चला कि बच्चों को दाखिले दिलाने में ही उम्र गुजर जाती है। चूंकि यह थ्रीपी मॉडल पर था, इसलिए ज्यादा मुश्किल नहीं आई। शमीना कहती हैं कि उनकी संस्था राइटवॉक बच्चों के शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ती रहेगी।

जिन्दगी का फलसफा : चुनौतियां मुझे पसंद हैं, इसके बिना लाइफ बोरिंग हो जाएगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें