राजधानी में मोदी की महारैली के बाद संघ परिवार परेशान है।
भीड़ के प्रबंधन और अन्य फैसलों पर फेल हुए प्रदेश प्रभारी अमित शाह और प्रदेश के पदाधिकारी निशाने पर हैं।
एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ना शुरू हो गया है। अमित शाह के प्रबंधन और उत्तर प्रदेश में उनकी भूमिका तथा स्थानीय नेताओं से समन्वय पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तेवर भी तल्ख हो गए हैं।
महारैली की स्थिति ने उसे चेता दिया है कि ऐसा ही रहा तो महारैली में भीड़ आने को लेकर किए जा रहे दावों का जो हश्र हुआ है, वैसा ही नतीजा चुनाव में भी सामने आ सकता है।
शाह और प्रदेश भाजपा की तरफ से जिस तरह पिछले एक महीने से महारैली में 15 लाख की भीड़ जुटाने के दावे किए जा रहे थे, वैसा नहीं हो पाया।
महारैली के दिन दोपहर तक मैदान का बड़ा हिस्सा खाली पड़ा रहा। बाद में लखनऊ के विभिन्न हिस्सों में गाड़ियां भेजकर मैदान को भरने की कोशिश की गई।
इस सबके बावजूद संख्या के लिहाज से महारैली में जुटी भीड़ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में हुई मोदी की अन्य रैलियों से भी तुलना नहीं कर पाई।
भारी पड़ी गुटबाजी व अंतर्कलह
कहा जा रहा है कि शाह और भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने जो कुछ और जिस तरह योजना बनाई थी, उसका हश्र यह होना ही था। इन लोगों ने यूपी में भाजपा की असलियत की अनदेखी करने की कोशिश की। नतीजतन महारैली में यह असलियत सार्वजनिक हो गई।
शाह और उनकी टीम ने महारैली को लेकर सारी व्यवस्थाएं केंद्रित कर दीं।
चुनावी प्रबंधन के मास्टर माने जा रहे अमित शाह पता नहीं कैसे उत्तर प्रदेश की इस सच्चाई को समझ नहीं पाए कि इस फैसले से गुटबाजी और बढ़ेगी।