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कवाल कांड: इसलिए सरकार नहीं चाहती सीबीआई जांच

Sat, 28 Sep 2013 02:32 AM IST
राजेन्द्र सिंह/लखनऊ
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राज्य सरकार मुजफ्फरनगर-शामली और आसपास के जिलों में हिंसा का सबब बने कवाल कांड की सीबीआई जांच से बच रही है।
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सवाल उठ रहा है कि शासन-प्रशासन के स्तर पर चूक-दर-चूक तो इसकी वजह नहीं ?

वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अफसर भी अब मान रहे हैं कि कवाल गांव में तीन हत्याओं के बाद निष्पक्ष कार्रवाई की गई होती तो हालात इस कदर न बिगड़ते।

कवाल कांड की सीबीआई जांच कराने के लिए वहां के एसएसपी प्रवीण कुमार शासन को पत्र लिख चुके हैं। विधानसभा से लेकर सड़कों तक यह मांग उठी लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं है।

नवनियुक्त एडीजी कानून व्यवस्था मुकुल गोयल ने स्वीकार किया है कि कवाल में पुलिस से चूक हुई है। कवाल में तीन हत्याओं के बाद निष्पक्षता से कार्रवाई हुई होती तो शायद हिंसा से बचा जा सकता था।
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पुलिस के स्तर से गलती के पीछे सियासी कारण माने जा रहे हैं। पूर्व डीजीपी डॉ. केएल गुप्ता कहते हैं कि पुलिस को काम करने की स्वतंत्रता कहां मिली?

तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी ने पांच-छह पांच हत्यारोपी पकड़वाए थे। उन्हें छोड़ दिया गया, एफआईआर बदल दी गई। वह कहते हैं, सत्ता पक्ष को खास वोट बैंक के ध्रुवीकरण का लाभ दिख रहा था इसलिए एकपक्षीय कार्रवाई हुई।

दूसरी तरफ भाजपा ने इसका फायदा उठाया। इसी सियासी गेम में तमाम बेकसूरों की जान चली गई। वह कहते हैं कि राजनेता जाति-धर्म की आड़ में गद्दी पर बैठे रहना चाहते हैं। इसके लिए वे गरीबों और मूर्खों का इस्तेमाल करते हैं।

क्या था घटनाक्रम
मुजफ्फरनगर से जानसठ रोड पर कवाल गांव में 27 अगस्त को पड़ोसी मलिकपुर गांव के सचिन और गौरव ने शाहनवाज की हत्या कर दी थी।

ग्रामीणों का आरोप है कि शाहनवाज कवाल से गुजकर स्कूल जाने वाली मलिकपुरा की लड़कियों से छेड़छाड़ करता था।

शाहनवाज की हत्या से आक्रोशित कवाल के लोगों ने मौके पर ही सचिन और गौरव को मौत के घाट उतार दिया था। उनका कहना है कि विवाद छेड़छाड़ का नहीं मोटर साइकिल-साइकिल के टकराने का था।

हत्याकांड के बाद शुरू हुई चूक
तीन युवकों की हत्या की खबर मिलते ही तत्कालीन डीएम सुरेन्द्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी कवाल गांव पहुंच गए थे। एसएसपी ने सर्च कराकर खून सने कपड़ों के साथ कुछ लोगों को पकड़वाया था।

सचिन और गौरव के इन संदिग्ध हत्यारोपियों को थाने में भेज दिया गया था। दोनों पक्षों को शांत करने के बाद डीएम-एसएसपी मुजफ्फरनगर लौटे तो उनका तबादला आदेश पहुंच गया।

इसे शासन स्तर पर पहली बड़ी चूक माना जा रहा है। इसके बाद से स्थानीय स्तर पर निष्पक्षता न बरते जाने केआरोपों को बड़े पुलिस अफसर भी स्वीकार कर रहे हैं।

गलत नामजदगी में फंसी पुलिस
थानेदार से लेकर पुलिस कप्तान तक सभी को मालूम था कि शाहनवाज को सचिन और गौरव ने उनके गांव में मारा। इसकी प्रतिक्रिया में भीड़ ने मौके पर ही सचिन और गौरव को मार डाला।

फिर भी शाहनवाज की हत्या में गौरव-सचिन के परिवारजनों समेत छह लोगों को नामजद किया गया। इसके बाद रात में थाने से हत्या के संदिग्ध आरोपी भी छोड़ दिए गए।

डीएम-एसएसपी के तबादले के सियासी दबाव के चलते गलत नामजदगी सारे बवाल का कारण बनी। इसी को वापस लेने के लिए 31 अगस्त और सात सितंबर को पंचायतें हुए। पुलिस ने फर्जी नामजदगी जब रद्द की तब तक नफरत की आग दर्जनों जिंदगियों को लील चुकी थी।
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एक और सवाल यह है कि घायल अवस्था में शाहनवाज को जानसठ के अस्पताल ले जाया गया। वहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।

शाहनवाज के शव को पोस्टमार्टम के बजाए गांव किसने भिजवाया। अगले दिन गांव में छिटपुट शरारतों ने भी माहौल गरमाया। वहां दोनों पक्षों में सुरक्षा का भरोसा पैदा नहीं हुआ।
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