पूर्वांचल के 10-12 जिलों के साथ बिहार के सासाराम, बक्सर व भभुआ समेत करीब 10 जिलों का राजनीतिक-सामाजिक मिजाज वाराणसी से प्रभावित होता रहा है।
इन जिलों के लोग इलाज से लेकर शिक्षा और धार्मिक कर्मकांड के लिए वाराणसी आते हैं। यहां से मोदी केउतरने का फायदा इन जिलों में भी मिलने की उम्मीद है।
पूर्वांचल में भाजपा के पास केवल दो सीटें, बनारस व आजमगढ़ हैं। संघ और विहिप की जड़ें भी यहां कमजोर नहीं हैं।
माना जा रहा है कि मोदी के यहां से चुनाव लड़ने पर भाजपा के लिए बंजर हो चुके इन जिलों में फिर से कमल खिल सकता है।
वाराणसी: जातीय गणित भी अहम
पटेल: 2 लाख
मुस्लिम: 2.50 लाख
ब्राह्मण: 2.50 लाख
वैश्य : 2 लाख
यादव: 1 लाख
भूमिहार : 90 हजार
ठाकुर: 65 हजार
दलित : 80 हजार
चौरसिया, बिंद सरीखी अन्य पिछड़ी जातियां: 1.50 लाख
और मुकाबले में केजरीवाल आए तो
अरविंद केजरीवाल कह चुके हैं कि मोदी जहां से चुनाव लड़ेंगे, उसी सीट पर वे भी दावेदारी पेश करेंगे।
छात्र आंदोलनों की इस उर्वर जमीन पर मोदी के साथ केजरीवाल की भी चर्चा है।
केजरीवाल यहां सक्रिय भाजपा विरोधी सामाजिक संगठनों की पसंद बन सकते हैं।
अगर मुस्लिम भी केजरीवाल के साथ हुए तो ऐसे में मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
आजमगढ़ से मुलायम लड़े तो क्या होगा असर
मुलायम सिंह यादव की मैनपुरी के अलावा आजमगढ़ से भी लड़ाने की चर्चा है।
यहां का यादव वोटर विधानसभा चुनाव में तो सपा के साथ रहता है लेकिन लोकसभा चुनाव में बाहुबली रमाकांत यादव की तरफ मुड़ जाता है।
यादव वोट न मिलने की संभावना के कारण मुस्लिम भी नहीं रीझता। मुलायम यहां से खुद मैदान में उतरकर यादव और मुस्लिम वोटरों को आकर्षित करना चाहते हैं।
राजनाथ की पसंद लखनऊ ही क्यों
लखनऊ पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी बाजपेयी की कर्मस्थली है। भाजपा 1991 से यहां लगातार जीत रही है।
ऐसे में जब प्रदेश में पार्टी का ग्राफ ऊपर उठता दिख रहा है तो भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह यह मौका चूकना नहीं चाहते।
यहां से उतरकर यह जताना चाहते हैं कि वे अटल की विरासत संभाल सकते हैं। भले ही इसके लिए निवर्तमान सांसद लालजी टंडन को कानपुर जाना पड़े।
राजनाथ की राह कितनी आसान
राजनाथ के सामने कांग्रेस से रीता बहुगुणा जोशी, सपा से अशोक वाजपेयी और बसपा से नकुल दुबे मैदान में हैं।
मुकाबले में तीन ब्राह्मण चेहरा होने से यह सीट भाजपा के लिए आसान नहीं रह गई है।
पिछले चुनाव में लालजी टंडन ब्राह्मण, वैश्य व कायस्थ मतों के सहारे बमुश्किल 38 हजार वोटों से ही जीत सके थे।
हालांकि, इस बार भाजपा नेताओं की आपसी खींचतान व गुटबाजी के चलते ब्राह्मïण वोट बिखर सकता है।
लखनऊ: क्या है जातीय गणित
ब्राह्मण : 3.50 लाख
मुस्लिम : 4.50 लाख
वैश्य : 1.50 लाख
कायस्थ : 1.25 लाख
उत्तराखंडी : 1.75 लाख
यादव : 1 लाख
ठाकुर : 60 हजार
दलित : 1 लाख
लोध : 50 हजार
कुर्मी, गड़रिया, कुम्हार, मल्लाह, कहार, माली, मौर्य, तमोली आदि : 2 लाख