भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के सूबे का उप मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश की चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसके लिए दावेदार अपने-अपने तरीके से अध्यक्ष बनने की लामबंदी में भी जुटे हैं।
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बावजूद इसके भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिस्से में जाने की संभावना मजबूत होती जा रही है। अध्यक्ष कौन होगा? यह तो भविष्य में साफ होगा लेकिन दलित वर्ग या अति पिछड़े वर्ग से ही किसी को सूबे में भाजपा की कमान सौंपे जाने की संभावनाएं काफी प्रबल नजर आ रही हैं।
ऐसा लगता है कि सूबे में भाजपा की सरकार होने के कारण अब संगठन के अध्यक्ष की कुर्सी पर भी कई तरह के समीकरणों को ध्यान में रखकर किसी को बैठाया जाएगा। जिससे सरकार चलाने वाले पर व्यक्ति का प्रभाव भी रहे और संवाद की सार्थकता भी रहे।
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इस लिहाज से किसी ऐसे चेहरे को बैठाने की उम्मीद है जो तेज-तर्रार हो। साथ ही दौड़भाग करने में भी सक्षम हो। जिससे सत्तारूढ़ दल के संगठन के नाते प्रभावी तरीके से भूमिका का निर्वाह किया जा सके। साथ ही लोगों को जोड़कर संगठन की साख और मजबूती भी न सिर्फ बनाए रखी जा सके बल्कि उसे बढ़ाया भी जा सके।
इन समीकरणों पर भी नजर
डेमो पिक
- फोटो : अमर उजाला
पार्टी के वरिष्ठ लोगों की मानें तो अध्यक्ष के लिए नाम तय करने के लिए अब कई तरह के समीकरणों को ध्यान में रखना होगा। न सिर्फ पूरब व पश्चिम के समीकरण संतुलित रखने होंगे बल्कि सरकार में मौजूद चेहरों व संगठन में शामिल किए जाने वाले चेहरों के बीच सामाजिक समीकरणों पर भी नजर रखनी होगी।
इसीलिए माना जा रहा है कि पश्चिम से ही किसी को अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना अधिक है। कारण, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के रूप में पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभावशाली प्रतिनिधित्व है तो विधानसभा अध्यक्ष के पद पर हृदयनारायण दीक्षित व उप मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. दिनेश शर्मा को बैठाकर सूबे के मध्य क्षेत्र को भी लगभग पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही बराबर महत्व दिया गया है।
इसलिए पश्चिम यूपी की ज्यादा संभावना
विधानसभा की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 140 सीटों में भाजपा को 116 सीटें मिली हैं। पश्चिम से 14 चेहरों को मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया है। इसमें सात कैबिनेट मंत्री हैं। इसके विपरीत पूरब से 10 तो मध्य से 8 चेहरों को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।
जाहिर है कि अच्छे प्रतिशत में सीटें जिताने के बावजूद सरकार में उस तुलना में हिस्सेदारी नहीं मिल पाई है। इस नाते भी पश्चिम से किसी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर समीकरणों को संतुलित बनाने की कोशिश की जा सकती है। साथ ही पश्चिम को यह संदेश देने की कोशिश की जा सकती है कि पार्टी उनके योगदान को भूली नहीं है।
इन्हें मिल सकता है मौका
अशोक कटारिया
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा व विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित के रूप में शीर्ष पदों पर तीन चेहरे अगड़े बैठाए जा चुके हैं। केशव प्रसाद मौर्य को उप मुख्यमंत्री बनाकर अति पिछड़ों को भी महत्व दिया जा चुका है। अगड़ों की तुलना में यह थोड़ा कम है।
इसलिए एक चर्चा यह भी है कि किसी अति पिछड़े चेहरे पर भी भाजपा फिर दांव लगाकर यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि उनका भी योगदान पार्टी ने भूला नहीं है। इस कड़ी में प्रदेश उपाध्यक्ष अशोक कटारिया व बाबू राम निषाद के नाम की खासी चर्चा है।
निषाद, केवट, मल्लाह, कश्यप जैसी प्रदेश की आबादी में लगभग 6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली बिरादरी के बाबूराम बुंदेलखंड के रहने वाले हैं। पार्टी ने यहां की 19 में सभी 19 सीटें जीती हैं। यही नहीं पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की कमान अभी तक पूरब व पश्चिम के हाथों में तो रह चुकी है लेकिन बुंदेलखंड को कभी मौका नहीं मिला है।
जहां तक कटारिया की दावेदारी का प्रश्न है तो गूजर जाति से संबंधित कटारिया के पक्ष में यह बात भी जाती है कि पश्चिम से बड़ी संख्या में गूजर वोट मिलने के बावजूद प्रदेश की मंत्रिपरिषद में इस जाति का कोई चेहरा मंत्री नहीं है।
इसलिए पार्टी के रणनीतिकार कटारिया के रूप में गूजर चेहरे को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाकर अति पिछड़ों के साथ पश्चिम के समीकरण को भी साधने की कोशिश कर सकते हैं।
माना जा रहा है कि 2019 के समीकरणों के मद्देनजर अनुसूचित जाति के चेहरे पर दांव लगाए जाने की संभावना ज्यादा है। कारण, कहीं न कहीं इस समीकरण पर पार्टी की गणित असंतुलित दिख रही है।
प्रदेश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित 86 सीटों में भाजपा गठबंधन ने इस बार 76 जीती है। प्रदेश सरकार में इस वर्ग से सिर्फ पांच मंत्री ही हैं। ऐसे में पार्टी के रणनीतिकार सूबे का नेतृत्व किसी दलित वर्ग के चेहरे को सौंपकर यह संदेश दे सकते हैं कि दलित जातियों के समर्थन को वह भूले नहीं हैं।
इस सिलसिले में जो नाम चर्चा में हैं उनमें आगरा से सांसद व पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री रामशंकर कठेरिया की दावेदारी काफी मजबूत मानी जा रही है। कठेरिया के अलावा हाथरस से सांसद राजेश दिवाकर, बुलंदशहर से सांसद भोला सिंह के नाम भी चर्चा में हैं।
इनके नाम चर्चा में होने के पीछे राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह से इनकी नजदीकी भी है। कहा जा रहा है कि भाजपा से जुड़े यूपी के ज्यादातर फैसलों में जिस तरह कल्याण की राय की छाया दिखती है, उसके चलते इनके नाम भी काफी मजबूत हैं। पश्चिम का समीकरण न रहा तो फिर कौशांबी से सांसद विनोद सोनकर भी दौड़ में शामिल हो सकते हैं।