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केंद्र में मोदी, यूपी में योगी, फिर भी बंद की कगार पर अटल की 'राष्ट्रधर्म'

Mon, 10 Apr 2017 10:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
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अटल बिहारी वाजपेयी
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भाजपा के शीर्ष पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के कार्यक्रमों के मंचों से तो पहले ही गायब हो चुके अब उनकी मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ पर भी संकट मंडराने लगा है। केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय ने पत्रिका की डायरेक्टरेट ऑफ एडवरटाइजिंग एंड विजुअल पब्लिसिटी (डीएवीपी) की मान्यता रद्द कर दी है। यानी केंद्र सरकार ने पत्रिका को अब अपने विज्ञापनों की पात्रता सूची से बाहर कर दिया है।
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पत्रिका को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राष्ट्र के प्रति लोगों को धर्म के बारे में जागरूक करने के मकसद से अगस्त 1947 में शुरू किया था। अटल बिहारी वाजपेयी संस्थापक संपादक रहे तो जनसंघ के संस्थापकों में शामिल पं. दीनदयाल उपाध्याय संस्थापक प्रबंधक थे।

केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय में अतिरिक्त महानिदेशक सत्येंद्र प्रकाश की ओर से 6 अप्रैल को जारी पत्र के मुताबिक देश के कुल 804 पत्र-पत्रिकाओं की डीएवीपी मान्यता रद्द की गई है। इसमें उत्तर प्रदेश के 165 पत्र व पत्रिका शामिल हैं। पत्र में अक्टूबर 2016 से पत्र व पत्रिकाओं की कॉपी पीआईबी व डीएवीपी के कार्यालय में जमा न कराने का तर्क दिया गया है। राष्ट्रधर्म पत्रिका पर प्रकाशित होने के बाद से अब तक गुजरे 70 सालों में पहली बार इस तरह का संकट आया है।
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इस तरह शुरू हुई थी पत्रिका

अटल बिहारी बाजपेयी
इस तरह कार्रवाई पूरी तरह अनुचित
राष्ट्रधर्म के प्रबंधक पवन पुत्र बादल का कहना है, हमें अभी तक इसकी जानकारी नहीं मिली है। अगर ऐसा हुआ है तो बिल्कुल गलत है। आपातकाल में जब इंदिरा गांधी ने हमारे कार्यालय को ही सील करा दिया था तब भी प्रकाशित होना बंद नहीं हुई। तब बचनेश त्रिपाठी (अब स्वर्गीय) ने खतरा उठाते हुए भी पत्रिका का प्रकाशन जारी रखा बल्कि उसे अपने तंत्र से वितरित भी कराते रहे। पत्रिका नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है और संबंधित कार्यालयों को भी भेजी जा रही है। अगर पत्रिका संबंधित कार्यालय को नहीं मिल रही थी तो उन्हें बीच में नोटिस देकर या अन्य तरीके से पूछना चाहिए था। पर, बिना नोटिस व पूछताछ के इस तरह का एकतरफा फैसला करना अनुचित है। सोमवार को इस बारे में पूरी जानकारी करके संबंधित को जवाब दिया जाएगा। 

इस तरह शुरू हुई थी पत्रिका
बात 1947 की है। अटल कानपुर में पढ़ रहे थे। संघ के तत्कालीन प्रांत प्रचारक भाऊराव देवरस और सह प्रांत प्रचारक दीनदयाल उपाध्याय ने एक मासिक पत्रिका निकालने की योजना बनाई। अटल भले ही किशोरावस्था में थे। पर, उनकी पहचान मंझे हुए साहित्यकार के रूप में हो चुकी थी। भाऊराव व दीनदयाल उपाध्याय ने उन्हें लखनऊ बुलाया । उन्हें ‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका का संपादक बनाया गया। ‘राष्ट्रधर्म’ के पहले ही अंक में उन्होंने चर्चित कविता ‘ हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, हिंदू रग-रग मेरा परिचय’ का प्रकाशन किया। इस पहले ही अंक से उन्होंने उस समय के प्रमुख साहित्यकार  सर सीताराम, डॉ. भगवान दास, अमृतलाल नागर, श्री नारायण चतुर्वेदी, आचार्य बृहस्पति व प्रोफेसर धर्मवीर को जोड़कर धूम मचा दी।
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