लखनऊ। मल्लिका-ए-गजल के नाम से मशहूर बेगम अख्तर को लखनऊ इतना पसंद था कि जब उनका मन मुंबई की फिल्मी चकाचौंध से उचट गया तो वे यहां लौट आईं। यहां के ठाकुरगंज में स्थित पसंदबाग में वे अपना ज्यादातर समय गुजारती थीं और बाद में वहीं पर उनकी मजार भी बनाई गई।
वो जो हम में तुम में करार था तुम्हें याद हो के न याद हो... और ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया... जैसी मशहूर गजलों को बेगम अख्तर ने अपनी दिलकश आवाज से अमर बना दिया। फैजाबाद में जन्मीं अख्तरी बाई आगे चलकर बेगम अख्तर के नाम से मशहूर हुईं। ठुमरी-दादरा और गजल गायिकी का जिक्र उनके बिना अधूरा लगता है। बेगम अख्तर की शिष्या रहीं प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका सुनीता झिंगरन ने 1972 के किस्से का जिक्र करते हुए बताया कि एक दिन बेगम अख्तर के शौहर इश्तियाक अहमद अब्बासी ने मरहूम नवाब जाफर अब्दुल्ला से कहा कि कोई सुनीता नाम की लड़की है जो बेगम की गजलें उनकी ही तरह से गाती फिरती है, उसे बेगम ने बुलवाया है। इस पर जाफर अब्दुल्ला और बेगम के देवर जहूर मियां मेरे घर पहुंचे और मेरे पिता से कहा कि बेगम अख्तर ने सुनीता झिंगरन की गिरफ्तारी का फरमान सुनाया है, हम उसे लेने आए हैं। यह सुनकर मेरे पिता जो कि मशहूर वैद्य थे चौंक गए और मैं भी डर गई। खैर, जहूर मियां की कार में मैं अपने पिता के साथ बेगम के बंगले पर पहुंची तो वे बीमार थीं। उन्होंने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा और गले से लगा लिया।
सुनीता झिंगरन ने बताया कि बेगम ने कहा कि तुम मेरी नकल करती हो तो मुझे कुछ सुनाओ। इस पर सुनीता ने निहरू निहरू... और उनकी मशहूर गजल वो जो हम में तुम में करार था... सुनाई। खुश होकर बेगम ने मुझे अपनी शिष्या बना लिया लेकिन मेरा दुर्भाग्य था कि करीब डेढ़ वर्ष ही उनसे सीख सखी और उनका इंतकाल हो गया। सुनीता झिंगरन ने कहा कि वे ज्ञान और संगीत का अथाह समंदर थीं जिनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती।
हमारे परिवार से था गहरा रिश्ता : सूफिया किदवई
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महानगर में रहने वाली 75 वर्षीय सूफिया किदवई बताती हैं कि हमारे परिवार से बेगम का गहरा रिश्ता रहा। बताया, मुझे याद है कि मेरे वालिद नदीमउर्रहमान किदवई दो बार बीमार हुए और दोनों बार वे उन्हें पहले बलरामपुर अस्पताल और फिर मेडिकल कॉलेज में देखने आती थीं। खास बात यह थी कि पहले उनका ड्राइवर एक बड़ा झाबा लेकर आता था जिसमें फल, जूस, बिस्किट समेत खूब सारा सामान होता था। जब ड्राइवर सामान रखकर चला जाता तब वे वार्ड में पहुंचती थीं और मेरे वालिद का हालचाल लेती थीं। सूफिया किदवई बताती हैं कि मेरे मरहूम भाई सलीम किदवई उनके बेहद करीबी रहे।
लखनऊ बायोस्कोप ने संजोईं मल्लिका-ए-गजल की यादें
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लखनऊ बायोस्कोप की ओर से बेगम अख्तर से जुड़ी यादों को संजोने के लिए कैसरबाग स्थित कार्यालय में प्रदर्शनी लगाई गई है। इस प्रदर्शनी में उनकी दुर्लभ तस्वीरें, गानों के रिकॉर्ड, उनके नाम पर जारी डाक टिकट, सिक्के, उनकी फिल्मों के कॉन्ट्रैक्ट समेत बहुत सी चीजें उपलब्ध हैं। उनके फैजाबाद और लखनऊ के घरों की तस्वीरों के साथ ही उनके कार्यक्रमों की फोटो भी मौजूद हैं। एक हारमोनियम भी यहां रखा है जो बेगम ने लखनऊ की गुड्डी को उपहार स्वरूप दिया था। बेगम की 51वीं पुण्यतिथि पर पसंदबाग स्थित उनकी मजार पर हर बार की तरह इस बार भी 30 अक्तूबर को हाजिरी कार्यक्रम का आयोजन होगा। जयपुर-अतरौली घराने की मशहूर शास्त्रीय गायिका पद्मश्री अश्विनी भिड़े देशपांडे प्रस्तुतियां देंगी।
इन मशहूर गजलों को दी बेगम ने अपनी दिलकश आवाज
ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया...। वो जो हम में तुम में करार था तुम्हें याद हो के न याद हो...। कुछ तो दुनिया की इनायत ने दिल तोड़ दिया...। दूर है मंजिल राहें मुश्किल आलम है तन्हाई का... और वफाओं के बदले जफा कर रहे हैं।