क्रांतिकारियों की धर पकड़ के नाम पर भी अंग्रेजों ने क्या नहीं किया। बात 9 अगस्त 1942 की है। अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर इस दिन लखनऊ में जो हुआ उसका वर्णन आसान नहीं है। महिबुल्लापुर, बख्शी का तालाब, इटौंजा, अटरिया स्टेशनों के पास रेल की पटरियां उखाड़ दी गई। टेलीफोन और बिजली के खंभे गिरा दिए गए। लखनऊ की कॉटन मिल फूंक दी गई।
इस मिल में अंग्रेजों के सैनिकों की वर्दी का कपड़ा तैयार होता था। ग्रामीण जनता ने भी इस क्रांति में पूरी भागीदारी ली। अंग्रेज बौखला गए। पता चला कि इस हिंसक आंदोलन का नेतृत्व करने वाला कोई लंगड़ा आदमी था।
दरअसल, वह लखनऊ के प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिवकुमार द्विवेदी थे, जिनका एक पैर अंग्रेजों की गोली से पहले घायल हो चुका था। ‘क्रांति आंदोलन कुछ अधखुले पन्ने’ से पता चलता है, ‘आंदोलन वाले दिन ही द्विवेदी जी ने आलमनगर रेलवे स्टेशन का खजाना लूटने की योजना बनाई।