300 लाख टन गेहूं का उत्पादन। फिर भी गरीबों को देने के लिए दूसरे राज्यों का सहारा। यह हाल है उत्तर प्रदेश का।
प्रदेश में अभी तक जितना गेहूं खरीदा गया है, वह सूबे के गरीबों के लिए दो महीने के लिए भी पर्याप्त नहीं है।
नतीजतन पंजाब व हरियाणा से गेहूं मंगाना पड़ेगा।
इस बार गेहूं खरीद का लक्ष्य 45 लाख टन रखा गया था। इसमें खाद्य विभाग और राज्य सरकार की अन्य एजेंसियों को मिलाकर लगभग 5 लाख टन गेहूं ही खरीदा जा सका है।
सरकारी गेहूं खरीद 30 जून तक ही होनी है। साफ है कि बचे 17 दिन में बाकी का 40 लाख टन खरीदने का लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद नहीं है।
ऐसे में उत्तर प्रदेश के गरीबों को दूसरे राज्यों का ही गेहूं खाना पड़ेगा।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। गेहूं से पहले धान खरीद में भी यही हुआ था। धान खरीद का लक्ष्य 25 लाख टन रखा गया था। पर, खरीद सिर्फ 7 लाख टन ही हो पाई थी।
नतीजतन धान का अच्छा उत्पादक राज्य होने के बावजूद यूपी में कोटे की दुकानों से वितरित होने वाला ज्यादातर चावल दूसरे राज्यों का है।
यह है स्थिति
प्रदेश में कोटे की दुकानों के जरिये गरीबों को वितरित करने और स्कूलों में मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं के लिए प्रतिमाह करीब 3 लाख टन गेहूं की जरूरत होती है।
जाहिर है कि खरीदे गए गेहूं से सूबे के गरीबों के घर की दो महीने की भी रोटी नहीं बन पाएगी। ऐसे में भारतीय खाद्य निगम को बाहर से गेहूं मंगाना ही होगा।
प्रदेश में गेहूं का गुणा-गणित
गरीब परिवारों की संख्या-1 करोड़ 6 लाख 79 हजार
इन परिवारों को हर महीने जरूरत-लगभग 1.25 लाख टन
एपीएल परिवारों को मिलाकर हर महीने जरूरत-लगभग 2 लाख टन
अन्य जरूरतों के लिए-लगभग 1 लाख टन