आसान शब्दों में कहें तो नमकीन पानी। वैज्ञानिक भाषा में कहें तो ऐसा पानी जिसमें सोडियम क्लोराइड मिला होता है। जब शरीर में सोडियम की मात्रा कम हो, तब इसे दिया जाता है। यदि शरीर में पानी है तो जरूरत नहीं पड़ती है।
खून में सेलाइन वाटर क्यों मिलाया जा रहा था तो इसके पीछे कारण ये है कि लाल रक्त कणिकाओं को अगर ऐसे पानी में मिला दें तो वह ऑस्मोसिस के कारण बर्स्ट हो जाएंगी। आसान शब्दों में कहें तो लाल रक्त कणिकाएं पानी को सोखकर नष्ट हो जाएंगी। धंधेबाज सेलाइन वाटर पर 100 रुपये खर्च करते हैं।
एसटीएफ एसएसपी अभिषेक सिंह ने कहा कि सेलाइन वाटर वाले खून में स्वत: जमने की क्षमता नहीं रह जाती है जो किसी भी मरीज का लिए जानलेवा साबित होगा। लोगों को पता भी नहीं चल सका होगा कि उनके मरीज की मौत क्यों हो गई।
यह गिरोह अवैध तरीके से खून निलाकर उसमें सेलाइन वाटर मिलाकर एक यूनिट को दो यूनिट में बदल देता था और ब्लड बैग में भरकर 2 से 3 हजार रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बेच देता था। खून में सेलाइन वाटर मिलाने के बाद उसे छोटे बैग में पीआरबीसी (पैक्ड रेड ब्लड सेल) दर्ज कर बेच देते थे।
- सरकारी अस्पतालों के ब्लड बैंक से ही रक्त लें। उसके बैग पर ग्रुप, एक्सपायरी नंबर, पंजीयन नंबर देख लें।
- यह भी देखें कि जहां से ब्लड ले रहे हैं वहां की व्यवस्थाएं ठीक हैं या नहीं। फ्रीजर की व्यवस्था जरूर देखें।
- ब्लड किसी फैक्ट्री में नहीं बनता है, इसलिए रक्तदान करें और उसके बदले रक्त लें।
- निजी ब्लड बैंक से रक्त ले रहे हैं तो देखें कि उसका पंजीयन है या नहीं।
एसटीएफ के अनुसार आरोपियों के पास से 4500-जाली ब्लड बैग लेबल (ओपी चौधरी ब्लड बैंक), 3500 जाली ब्लड बैग लेबल (शेखर ब्लड बैंक), 3000 जाली फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा लेबल (मेडिसिन ब्लड बैंक) और चार जाली स्टैम्प बरामद हुए। पूछताछ में एक ऐसे कर्मचारी के बारे में पता चला है जो तीन सौ रुपए में इस गिरोह को ब्लड बैग भेजता था।